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चमोली में बाघ और भालू का बढ़ता खौफ, जंगल जाने से डरने लगीं ग्रामीण महिलाएं

गोपेश्वर, 06 सितंबर। पहाड़ के जंगल लंबे समय से ग्रामीणों की जिंदगी और आजीविका का महत्वपूर्ण आधार रहे हैं। चारा-पत्ती और लकड़ी जुटाने से लेकर पशुपालन तथा रोजमर्रा की जरूरतों तक ग्रामीण आबादी की निर्भरता जंगलों पर रही है। लेकिन चमोली में लगातार सामने आ रही घटनाओं के बाद यही जंगल अब ग्रामीणों के लिए डर और दहशत का कारण बनते जा रहे हैं। कुछ ही दिनों के भीतर भालू और बाघ के हमलों की दो घटनाओं ने मानव-वन्यजीव संघर्ष की गंभीर होती तस्वीर सामने रख दी है।

पाडुली गांव में दो महिलाओं पर बाघ का हमला

पोखरी क्षेत्र में भालू के हमले से दो महिलाओं की चट्टान से गिरकर मौत की घटना का सदमा ग्रामीणों के जेहन से निकला भी नहीं था कि जिला मुख्यालय गोपेश्वर के निकट पाडुली गांव में दो महिलाओं पर बाघ ने हमला कर दिया। हालांकि दोनों महिलाएं सुरक्षित बच गईं, लेकिन घटना के बाद गांव में भय का माहौल है। सबसे अधिक चिंता उन महिलाओं को लेकर है, जिन्हें अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए मजबूरन जंगल जाना पड़ता है।

रविवार को पाडुली गांव के जंगल में गर्थातोक के समीप पंडोली धार में जंगल गई दो महिलाओं पर बाघ ने हमला कर दिया। ग्रामीणों के अनुसार, बाघ ने महिलाओं को निशाना बनाने की कोशिश की, लेकिन दोनों किसी तरह अपनी जान बचाने में सफल रहीं। घटना की सूचना मिलने के बाद ग्रामीणों में भय और बढ़ गया है।

ग्रामीणों का कहना है कि क्षेत्र में बाघ की सक्रियता पहले से बनी हुई है। बाघ कई बार आबादी के आसपास दिखाई देने के साथ ही मवेशियों को भी अपना शिकार बना चुका है। अब महिलाओं पर हमला होने के बाद ग्रामीणों की चिंता और बढ़ गई है।

पोखरी में भालू के हमले ने झकझोरा

पाडुली की घटना से पहले पोखरी विकासखंड के नेल-सिदेली गांव में भालू के हमले ने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया था। जंगल गई दो महिलाओं पर भालू ने हमला कर दिया। अचानक सामने आए भालू से बचने के लिए दोनों महिलाएं भागीं, लेकिन इसी दौरान एक महिला चट्टान से नीचे गिर गई और उसकी मौत हो गई। दूसरी महिला भी गंभीर रूप से घायल हुई।

इस घटना ने जंगल से लगे गांवों में रहने वाली महिलाओं की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रोजमर्रा की जरूरतों के लिए जंगल जाना उनकी मजबूरी है, लेकिन अब यही जंगल उनके लिए खतरे का स्थान भी बनते जा रहे हैं।

जंगल पर निर्भर ग्रामीण महिलाओं के सामने बढ़ी चुनौती

पहाड़ के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी बड़ी संख्या में महिलाएं चारा-पत्ती और लकड़ी जुटाने के लिए जंगल जाती हैं। पशुपालन और कृषि आधारित जीवन में जंगल उनकी आजीविका का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ऐसे में जंगल में बाघ या भालू की मौजूदगी केवल वन्यजीवों से जुड़ा विषय नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण परिवारों की सुरक्षा और आजीविका से भी सीधे जुड़ा सवाल है।

पाडुली में बाघ के हमले के बाद महिलाओं में भय का माहौल है। ग्रामीणों का कहना है कि अब जंगल जाने से पहले कई बार सोचना पड़ रहा है। महिलाएं अकेले जंगल जाने से कतरा रही हैं। समूह में जाने के बावजूद वन्यजीवों के हमले का डर बना हुआ है।

निगरानी बढ़ाने की मांग

ग्रामीणों का कहना है कि वन विभाग को वन्यजीवों के हमले के बाद कार्रवाई करने के बजाय संवेदनशील क्षेत्रों में पहले से निगरानी बढ़ानी चाहिए। जिन इलाकों में बाघ और भालू की लगातार सक्रियता बनी हुई है, वहां कैमरा ट्रैप, नियमित गश्त और ग्रामीणों को समय-समय पर सतर्क करने की व्यवस्था होनी चाहिए।

ग्रामीणों की मांग है कि आबादी से लगे जंगलों में वन्यजीवों की गतिविधियों की नियमित निगरानी की जाए और हमलावर वन्यजीवों की पहचान कर सुरक्षा के प्रभावी कदम उठाए जाएं।

लगातार सामने आ रही घटनाएं वन विभाग के सामने दोहरी चुनौती खड़ी कर रही हैं। एक ओर वन्यजीवों का संरक्षण जरूरी है, वहीं जंगल से सटे गांवों में रहने वाले लोगों की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

चमोली के पहाड़ी गांवों में बाघ और भालू का बढ़ता खौफ अब केवल वन्यजीवों की मौजूदगी का मामला नहीं रह गया है। यह ग्रामीण महिलाओं की सुरक्षा, उनकी आजीविका और गांवों में सामान्य जनजीवन से जुड़ा गंभीर सवाल बन चुका है। जंगल ग्रामीणों की जरूरत हैं, लेकिन उन्हें सुरक्षित बनाना भी व्यवस्था की बड़ी जिम्मेदारी है।

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