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12 साल बाद फिर गूंजे नंदा के जयकारे, कैलाश की ओर बढ़ रही मां नंदा की डोलियां

गोपेश्वर, 06 सितंबर। 12 साल के लंबे इंतजार के बाद एक बार फिर पूरा पहाड़ मां नंदा के जयकारों से गूंज उठा है। मां नंदा की डोलियां जैसे-जैसे कैलाश की ओर बढ़ रही हैं, यात्रा के हर पड़ाव पर श्रद्धा और भावनाओं का सैलाब उमड़ रहा है। कहीं ढोल-दमाऊं और जागरों के साथ नंदा का स्वागत हो रहा है तो कहीं अपनी बेटी को विदा करते समय ध्याणियों की आंखें नम हो रही हैं। बंड, दशोली और बधाण के क्षेत्रों के साथ ही पहाड़ के घर-गांव भी इन दिनों नंदा के उत्सव में डूबे हुए हैं।

दूसरे पड़ाव के लिए रवाना हुईं नंदा की डोलियां

मां नंदा देवी की बड़ी जात यात्रा के तहत रविवार को विभिन्न नंदा डोलियां अपने पहले पड़ाव से दूसरे पड़ाव के लिए रवाना हुईं। मां राजराजेश्वरी बधाण की नंदा डोली चरबंग से मथकोट पहुंची। वहीं कुरुड़ दशोली की नंदा डोली कुमजुग से लुणतरा और बंड की नंदा डोली मैठाणा से बाटुला गांव पहुंची।

गांवों में डोलियों के पहुंचते ही ग्रामीणों ने पारंपरिक लोकगीतों, जागरों और पूजा-अर्चना के साथ उनका भव्य स्वागत किया। हर पड़ाव पर नंदा के जयकारों के बीच श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह दिखाई दिया।

बेटी की विदाई जैसा भावुक रहा नंदा डोली का प्रस्थान

नंदा की डोली के अगले पड़ाव के लिए रवाना होने का दृश्य भावुक कर देने वाला रहा। अपनी बेटी को कैलाश के लिए विदा करने पहुंचीं ध्याणियां डोली के सामने फफक पड़ीं। किसी ने हाथ जोड़कर मां नंदा से परिवार की खुशहाली की कामना की तो किसी ने नम आंखों से अपनी बेटी को विदा किया। डोली के आगे बढ़ते ही पड़ाव पर उदासी छा गई।

मान्यता है कि मां नंदा को पहाड़ की बेटी माना जाता है। इसलिए नंदा की विदाई यहां केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मायके से बेटी की विदाई जैसी भावना से जुड़ी है। 12 साल बाद आए इस अवसर ने इस भावनात्मक जुड़ाव को और गहरा कर दिया है।

भारी बारिश के बीच हुआ बंड की नंदा डोली का स्वागत

बंड की नंदा डोली के स्वागत के दौरान मौसम भी श्रद्धालुओं की आस्था के आगे बेअसर नजर आया। भारी बारिश के बीच बंड की नंदा डोली अपने पहले पड़ाव मैठाणा से बाटुला गांव पहुंची। बारिश के बावजूद जगह-जगह ग्रामीण डोली के स्वागत के लिए खड़े रहे। लोकगीतों और जागरों के बीच मां नंदा के जयकारे गूंजते रहे।

नंदा की बड़ी जात यात्रा से जीवंत हुई लोक संस्कृति

नंदा की डोली के कैलाश की ओर प्रस्थान को लेकर ग्रामीणों में उत्साह बना हुआ है। 12 साल बाद मिले इस अवसर के लिए गांवों में पहले से ही तैयारियां की गई थीं। डोली जिस गांव से गुजर रही है, वहां ग्रामीण पारंपरिक तरीके से उसका स्वागत कर रहे हैं।

नंदा की बड़ी जात यात्रा के साथ पहाड़ की लोक संस्कृति भी जीवंत हो उठी है। डोलियों के साथ चल रहे श्रद्धालु, जागर गायक और ग्रामीण यात्रा को लोक परंपराओं से जोड़ रहे हैं। हर पड़ाव पर नंदा के स्वागत और विदाई के अलग-अलग भावनात्मक रंग दिखाई दे रहे हैं।

12 साल बाद निकली नंदा की बड़ी जात ने एक बार फिर यह दर्शाया है कि पहाड़ के लिए मां नंदा केवल आराध्य देवी नहीं, बल्कि हर घर की बेटी और पूरे पहाड़ की भावनाओं से जुड़ा आत्मीय रिश्ता हैं।

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