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दहेज में सात पौधे मांगकर भोज साहू ने रची हरियाली की ऐसी मिसाल, जो 12 राज्यों तक पहुंची


कांतिलाल मांडोत

दहेज हमारे समाज की उन कुरीतियों में शामिल है, जिसने न जाने कितने परिवारों को आर्थिक और सामाजिक संकट में डाला है। विवाह जैसे पवित्र संस्कार को जब धन, जेवर, वाहन और संपत्ति की मांग से जोड़ दिया जाता है, तो रिश्तों की गरिमा भी प्रभावित होती है। आज भी अनेक परिवार दहेज की अपेक्षाओं के बोझ से दबे दिखाई देते हैं। ऐसे समय में छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के एक युवक ने विवाह के अवसर पर ऐसी मांग रखी, जिसने दहेज की कुरीति के बीच पर्यावरण संरक्षण की एक नई और प्रेरक राह दिखाई।

ग्राम देवरी (ए) निवासी भोज साहू ने विवाह के समय दहेज में न जेवर मांगे, न वाहन और न ही नकदी। उन्होंने केवल सात पौधे मांगे। शायद उस समय किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि ये सात पौधे आगे चलकर एक ऐसी मुहिम की नींव बनेंगे, जिसकी हरियाली आज छत्तीसगढ़ से निकलकर देश के 12 राज्यों तक पहुंच चुकी है।

भोज साहू की यह पहल केवल एक प्रतीकात्मक कदम बनकर नहीं रह गई। पिछले सात वर्षों से वे लगातार लोगों को पेड़ लगाने और पर्यावरण बचाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। आज गांव और आसपास के क्षेत्र में उनकी पहचान ‘बीज दूत’ के रूप में है। उन्होंने प्रकृति के प्रति अपने प्रेम को व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे समाज के साथ साझा करने का संकल्प लिया। यही कारण है कि अब तक वे छत्तीसगढ़ के अलावा बिहार, झारखंड, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, पश्चिम बंगाल और पंजाब सहित 12 राज्यों के करीब 1200 लोगों तक निशुल्क बीज पहुंचा चुके हैं।

भोज साहू की कहानी यह बताती है कि किसी बड़े बदलाव के लिए हमेशा बड़े साधनों की आवश्यकता नहीं होती। कभी-कभी एक छोटा-सा संकल्प भी दूर तक प्रभाव पैदा कर सकता है। विवाह के समय सात पौधों की मांग देखने में भले ही छोटी बात लगती हो, लेकिन इसके पीछे पर्यावरण के प्रति एक गहरी संवेदना छिपी थी। उन्होंने यह संदेश दिया कि विवाह केवल दो परिवारों का मिलन नहीं, बल्कि जीवन को बेहतर दिशा देने का अवसर भी हो सकता है।

आज जब विवाह समारोहों में दिखावे और अनावश्यक खर्च की प्रतिस्पर्धा दिखाई देती है, तब भोज साहू का यह निर्णय समाज के सामने एक अलग उदाहरण प्रस्तुत करता है। उन्होंने दहेज की उस परंपरा को ही पर्यावरण संरक्षण से जोड़ दिया, जो लंबे समय से सामाजिक बुराई का रूप ले चुकी है। सात पौधे उनके लिए केवल पौधे नहीं थे, बल्कि आने वाले वर्षों की हरियाली, शुद्ध हवा और नई पीढ़ी के सुरक्षित भविष्य का संकल्प थे।

बीज बांटकर लोगों को पेड़ लगाने के लिए कर रहे प्रेरित

भोज साहू की पर्यावरण यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि वे केवल लोगों को पेड़ लगाने की सलाह नहीं देते, बल्कि उन्हें बीज भी उपलब्ध कराते हैं। सोशल मीडिया के माध्यम से जब उन्हें किसी व्यक्ति की बीज की जरूरत की जानकारी मिलती है, तो वे अपने स्तर पर बीजों का पैकेट तैयार करते हैं और उसे स्पीड पोस्ट के माध्यम से संबंधित व्यक्ति तक पहुंचाते हैं। एक पैकेट में सामान्यतः 100 से 200 तक बीज होते हैं। इन पैकेटों में अलग-अलग प्रजातियों के बीज शामिल किए जाते हैं, ताकि लोग अपनी परिस्थितियों के अनुसार उनका रोपण कर सकें।

यह काम बिना किसी व्यावसायिक उद्देश्य के किया जा रहा है। इसका मकसद अधिक से अधिक लोगों को पौधारोपण से जोड़ना और उन्हें यह समझाना है कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार या किसी संस्था की जिम्मेदारी नहीं है। हर व्यक्ति अपने स्तर पर प्रकृति के लिए कुछ कर सकता है। एक व्यक्ति यदि कुछ पौधे लगाता है और उनकी देखभाल करता है, तो वह अपने आसपास के वातावरण में सकारात्मक बदलाव की शुरुआत कर सकता है।

भोज साहू की पहल बीज बांटने तक सीमित नहीं है। उन्होंने करीब तीन हजार सीड बॉल भी तैयार किए हैं। जैविक सामग्री और मिट्टी में बीज डालकर तैयार किए गए इन सीड बॉल को बारिश से पहले सड़क किनारे, पहाड़ियों और खाली जमीनों पर डाला जाता है। बारिश का पानी मिलने के बाद इनमें मौजूद बीजों के अंकुरित होने की संभावना बढ़ जाती है और प्रकृति को नए पौधे मिलते हैं।

इस काम में वे स्कूली बच्चों और ग्रामीणों को भी जोड़ते हैं। इससे बच्चों में प्रकृति के प्रति संवेदना विकसित होती है और ग्रामीणों को भी अपने आसपास की हरियाली के महत्व का एहसास होता है। यह पहल आने वाली पीढ़ी को केवल पर्यावरण संरक्षण का पाठ पढ़ाने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उन्हें प्रत्यक्ष रूप से प्रकृति से जोड़ती है।

सीड बॉल का प्रयोग उन स्थानों पर विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है, जहां नियमित रूप से पौधारोपण करना कठिन होता है। बारिश के मौसम का लाभ लेकर ऐसे क्षेत्रों में बीज पहुंचाए जाते हैं और फिर प्रकृति को अपना काम करने का अवसर दिया जाता है। इस तरह एक छोटा-सा बीज भविष्य में पेड़ बनने की संभावनाओं को जन्म देता है।

पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए जल शक्ति मंत्रालय की ओर से भी भोज साहू को सम्मानित किया जा चुका है। यह सम्मान उनके लिए केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि उस विचार की स्वीकार्यता है, जिसे उन्होंने अपने जीवन में अपनाया है। उनका मानना है कि प्रकृति को बचाने के लिए हर व्यक्ति को अपनी भूमिका तय करनी होगी।

आज पर्यावरण के सामने अनेक चुनौतियां हैं। बढ़ता प्रदूषण, घटते वन क्षेत्र, जल संकट, तापमान में वृद्धि और प्राकृतिक संसाधनों का लगातार दोहन आने वाली पीढ़ियों के लिए गंभीर चिंता का विषय है। ऐसे समय में पौधारोपण और स्थानीय स्तर पर हरियाली बढ़ाने की पहल का महत्व और बढ़ जाता है। भोज साहू जैसे लोग यह विश्वास पैदा करते हैं कि बदलाव की शुरुआत किसी बड़े मंच से नहीं, बल्कि अपने घर, गांव और आसपास से भी की जा सकती है।

दहेज की कुरीति के बीच दिया सामाजिक बदलाव का संदेश

भोज साहू की कहानी पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ सामाजिक सुधार का भी संदेश देती है। दहेज की मांग ने वर्षों से अनेक परिवारों को परेशान किया है। कई बार विवाह परिवारों के लिए आर्थिक बोझ बन जाता है और बेटियों को लेकर समाज में असुरक्षा की भावना पैदा होती है। ऐसे वातावरण में यदि कोई युवक दहेज के रूप में पौधे मांगता है, तो वह परंपरा को चुनौती देने के साथ-साथ एक सकारात्मक विकल्प भी सामने रखता है।

सात पौधों की वह मांग समाज को यह सोचने के लिए प्रेरित करती है कि दहेज में आखिर ऐसी कौन-सी चीज मांगी जाए, जो परिवार और समाज के लिए उपयोगी हो। यदि विवाह के अवसर पर धन और वस्तुओं के बजाय पौधे लगाए जाएं, तो वह उत्सव आने वाली पीढ़ियों के लिए भी यादगार बन सकता है। एक पौधा वर्षों तक बढ़ता है, छाया देता है, वातावरण को बेहतर बनाने में योगदान करता है और आने वाले लोगों को भी प्रकृति से जोड़ता है।

भोज साहू की पहल इस बात का प्रमाण है कि सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ केवल भाषणों की जरूरत नहीं, बल्कि व्यवहार में बदलाव की जरूरत है। उन्होंने अपने विवाह के अवसर पर जो फैसला लिया, उसे बाद के वर्षों में लगातार अपने कार्यों के माध्यम से आगे बढ़ाया। यही कारण है कि सात पौधों से शुरू हुई उनकी यात्रा आज हजारों बीजों और सैकड़ों लोगों तक पहुंच चुकी है।

दुनिया में ऐसे लोग विरले ही होते हैं, जो अपनी मिट्टी और प्रकृति से इतना गहरा प्रेम करते हैं कि उसे अपने जीवन का उद्देश्य बना लेते हैं। भोज साहू ने यह दिखाया है कि पर्यावरण संरक्षण केवल बड़ी योजनाओं और करोड़ों रुपये के बजट से ही संभव नहीं है। एक सामान्य व्यक्ति भी यदि ठान ले, तो वह अपने स्तर पर बड़ा परिवर्तन ला सकता है।

उनकी कहानी समाज के सामने एक सीधा संदेश रखती है कि हमें प्रकृति से लेने के साथ उसे लौटाने की जिम्मेदारी भी निभानी होगी। एक पौधा लगाना आसान है, लेकिन उसे बड़ा करना और उसकी रक्षा करना उससे भी बड़ी जिम्मेदारी है। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में कुछ पौधों की जिम्मेदारी ले और उन्हें पेड़ बनने तक सुरक्षित रखे, तो देश के पर्यावरण में बड़ा बदलाव आ सकता है।

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भोज साहू की पहचान आज केवल बालोद के एक ग्रामीण के रूप में नहीं, बल्कि बीजों के माध्यम से हरियाली का संदेश फैलाने वाले एक प्रेरक व्यक्ति के रूप में बन चुकी है। विवाह में मांगे गए सात पौधों ने उनके जीवन को एक नई दिशा दी और वही सात पौधे आज हजारों बीजों के रूप में देश के अलग-अलग हिस्सों में हरियाली का सपना बो रहे हैं।

उनकी कहानी बताती है कि दहेज में मांगा गया पौधा केवल एक पौधा नहीं होता, बल्कि वह आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन का उपहार हो सकता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि भोज साहू की इस पहल को केवल एक प्रेरक कहानी मानकर आगे न बढ़ जाएं, बल्कि इससे सीख लेकर अपने जीवन में भी प्रकृति के लिए कोई संकल्प लिया जाए।

विवाह हो, जन्मदिन हो या कोई अन्य शुभ अवसर, यदि हम दिखावे और अनावश्यक खर्च के बजाय पौधे लगाने और उनकी देखभाल को प्राथमिकता दें, तो ऐसे अवसर समाज और प्रकृति दोनों के लिए सार्थक बन सकते हैं। सात पौधों से शुरू हुई भोज साहू की यह यात्रा यही संदेश देती है कि जब किसी व्यक्ति के मन में अपनी मिट्टी के लिए प्रेम और प्रकृति के लिए संवेदना हो, तो उसके छोटे कदम भी एक दिन बड़े जंगल की उम्मीद बन सकते हैं।

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