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भारतीय चिकित्सा व्यवस्था: आयुर्वेद से आधुनिक विज्ञान तक स्वस्थ भारत की सशक्त यात्रा

— सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’

“सर्वे सन्तु निरामयाः”—यह केवल एक वैदिक प्रार्थना नहीं, बल्कि भारतीय चिकित्सा दर्शन का मूल मंत्र है। भारत की चिकित्सा परंपरा का उद्देश्य केवल रोग का उपचार करना नहीं रहा, बल्कि मनुष्य के शरीर, मन और आत्मा के संतुलन के माध्यम से संपूर्ण स्वास्थ्य की स्थापना करना रहा है। यही कारण है कि भारतीय चिकित्सा व्यवस्था विश्व की सबसे प्राचीन, समृद्ध और जीवन-दृष्टि आधारित चिकित्सा प्रणालियों में गिनी जाती है।

आज जब विश्व नई-नई बीमारियों, जीवनशैली संबंधी विकारों और मानसिक तनाव जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब भारत की पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियां—आयुर्वेद, योग, सिद्ध और यूनानी—आधुनिक चिकित्सा के साथ मिलकर एक समन्वित स्वास्थ्य मॉडल की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। यह केवल चिकित्सा के विकास की यात्रा नहीं, बल्कि “स्वस्थ भारत” के निर्माण की दिशा में एक सशक्त राष्ट्रीय प्रयास है।

भारत में चिकित्सा विज्ञान का इतिहास हजारों वर्षों पुराना है। वैदिक साहित्य, विशेषकर अथर्ववेद, में रोगों, औषधियों और उपचार पद्धतियों का उल्लेख मिलता है। महर्षि चरक ने शरीर की प्रकृति, रोगों के कारण और उपचार के विभिन्न पहलुओं का विस्तृत वर्णन करते हुए चरक संहिता की रचना की, जबकि महर्षि सुश्रुत ने शल्य चिकित्सा को व्यवस्थित रूप दिया। सुश्रुत संहिता में नाक के पुनर्निर्माण, मोतियाबिंद की शल्य चिकित्सा तथा अनेक शल्य तकनीकों का उल्लेख मिलता है, जो चिकित्सा इतिहास में भारत की महत्वपूर्ण उपलब्धियों को दर्शाते हैं।

आयुर्वेद का मूल सिद्धांत रोग के कारणों को समझकर शरीर के प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखना है। इसलिए भारतीय चिकित्सा परंपरा केवल औषधियों पर निर्भर नहीं रही, बल्कि आहार, विहार, दिनचर्या, ऋतुचर्या और मानसिक संतुलन पर भी समान रूप से बल देती है।

स्वतंत्रता के समय भारत के सामने स्वास्थ्य सेवाओं की बड़ी चुनौती थी। संक्रामक रोग, कुपोषण, सीमित अस्पताल, प्रशिक्षित चिकित्सकों की कमी और ग्रामीण क्षेत्रों तक चिकित्सा सुविधाओं का अभाव प्रमुख समस्याएं थीं। इसके बाद देश ने चिकित्सा शिक्षा, अस्पतालों, टीकाकरण कार्यक्रमों और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं का धीरे-धीरे विस्तार किया।

आज देश में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), अनेक सरकारी एवं निजी मेडिकल कॉलेज, सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल तथा उन्नत अनुसंधान संस्थान चिकित्सा क्षेत्र को नई ऊंचाइयों पर ले जा रहे हैं। अंग प्रत्यारोपण, रोबोटिक सर्जरी, कैंसर उपचार, हृदय रोग चिकित्सा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निदान जैसी तकनीकें भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बना रही हैं।

भारत ने आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी जैसी चिकित्सा प्रणालियों को संस्थागत स्वरूप देकर आयुष व्यवस्था को विकसित किया है। आज विश्वभर में योग और आयुर्वेद के प्रति बढ़ती रुचि भारत की चिकित्सा विरासत की वैश्विक पहुंच को दर्शाती है।

आयुष की विशेषता यह है कि इसमें रोग के उपचार के साथ-साथ रोग की रोकथाम, स्वस्थ जीवनशैली और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता पर भी जोर दिया जाता है। आधुनिक चिकित्सा के साथ इसका वैज्ञानिक और संतुलित समन्वय भविष्य की समग्र स्वास्थ्य व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।

पिछले वर्षों में भारत ने स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुलभ बनाने की दिशा में अनेक पहल की हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का विस्तार, टीकाकरण अभियान, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य कार्यक्रम, जन औषधि केंद्र, आयुष्मान भारत जैसी योजनाएं तथा डिजिटल स्वास्थ्य सेवाएं आम नागरिक तक चिकित्सा सुविधाएं पहुंचाने का प्रयास कर रही हैं।

कोविड-19 महामारी ने यह भी सिद्ध किया कि चिकित्सक, नर्स, पैरामेडिकल स्टाफ, वैज्ञानिक और अन्य स्वास्थ्यकर्मी किसी भी राष्ट्र की महत्वपूर्ण शक्ति होते हैं। महामारी के दौरान स्वास्थ्यकर्मियों ने अपनी सुरक्षा की चिंता किए बिना मानवता की सेवा का उल्लेखनीय उदाहरण प्रस्तुत किया।

चिकित्सा विज्ञान में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) नई संभावनाओं का आधार बन रही है। रोगों की प्रारंभिक पहचान, मेडिकल इमेज का विश्लेषण, व्यक्तिगत उपचार योजना, दूरस्थ परामर्श यानी टेलीमेडिसिन और डिजिटल स्वास्थ्य अभिलेख स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक प्रभावी बनाने में मदद कर रहे हैं। हालांकि, यह ध्यान रखना होगा कि मशीनें चिकित्सकीय निर्णयों में सहायता कर सकती हैं, लेकिन रोगी के प्रति संवेदना, विश्वास और मानवीय स्पर्श का स्थान नहीं ले सकतीं।

भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था ने उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन अनेक चुनौतियां अभी भी सामने हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी, कुपोषण और एनीमिया, जीवनशैली से जुड़े रोग जैसे मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा और हृदय रोग, मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता का अभाव, प्रदूषण से जुड़े रोग तथा स्वास्थ्य सेवाओं में क्षेत्रीय असमानताएं प्रमुख चुनौतियां हैं।

इन समस्याओं का समाधान केवल सरकार के प्रयासों से संभव नहीं है। समाज, चिकित्सकों, शिक्षण संस्थानों, स्वास्थ्य संस्थाओं और प्रत्येक नागरिक की सक्रिय सहभागिता आवश्यक है।

स्वास्थ्य केवल अस्पतालों से नहीं, बल्कि स्वस्थ आदतों से भी बनता है। संतुलित भोजन, नियमित व्यायाम, योग, स्वच्छता, समय पर टीकाकरण, नशामुक्त जीवन, पर्याप्त नींद और नियमित स्वास्थ्य परीक्षण प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी है। बीमारी होने के बाद उपचार कराने के साथ-साथ बीमारी से बचाव और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता को भी प्राथमिकता देनी होगी।

यदि भारत अपनी प्राचीन चिकित्सा परंपरा और आधुनिक विज्ञान का संतुलित एवं वैज्ञानिक समन्वय करते हुए जनकेंद्रित स्वास्थ्य व्यवस्था विकसित करता है, तो वह न केवल अपने नागरिकों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान कर सकता है, बल्कि विश्व के सामने समग्र स्वास्थ्य का एक प्रभावी मॉडल भी प्रस्तुत कर सकता है।

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भारतीय चिकित्सा व्यवस्था केवल उपचार का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित, स्वस्थ और सार्थक बनाने की एक व्यापक दृष्टि है। चरक की ज्ञानपरंपरा, सुश्रुत की शल्य चिकित्सा संबंधी विरासत, योग की साधना और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की उपलब्धियां मिलकर ऐसे भारत के निर्माण में योगदान दे सकती हैं, जहां प्रत्येक नागरिक स्वस्थ, जागरूक और सक्षम हो।

“स्वस्थ भारत” का स्वप्न तभी साकार होगा, जब चिकित्सा केवल अस्पतालों तक सीमित न रहकर जन-जन की जीवनशैली का अभिन्न अंग बने। स्वास्थ्य सबसे बड़ा धन है। जिस राष्ट्र के नागरिक स्वस्थ होते हैं, वही राष्ट्र आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी अधिक सशक्त बनता है। इसलिए चिकित्सा व्यवस्था को केवल सरकारी दायित्व नहीं, बल्कि राष्ट्रीय उत्तरदायित्व के रूप में देखना होगा।

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