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के. एन. सिंह: जेंटलमैन विलेन के नाम से मशहूर इस दिग्गज अभिनेता ने ऐसे बनाई थी हिंदी सिनेमा में पहचान

मुंबई, 01 सितंबर: हिंदी सिनेमा की लोकप्रियता को दुनिया भर में पहुंचाने में पर्दे के खलनायकों की भी अहम भूमिका रही है। इन्हीं दिग्गज कलाकारों में के. एन. सिंह का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। उनका पूरा नाम कृष्ण निरंजन सिंह था। वह भारतीय सिनेमा के शुरुआती दौर के प्रसिद्ध खलनायकों और चरित्र अभिनेताओं में शामिल थे। अपने पांच दशक लंबे अभिनय करियर में उन्होंने 200 से अधिक हिंदी फिल्मों में काम किया।

बिना चीखे-चिल्लाए खलनायकी को बनाया खास

के. एन. सिंह की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वह पर्दे पर चीखे-चिल्लाए बिना अपने नकारात्मक किरदार को प्रभावशाली बना देते थे। कातिलाना नजरें, गहरी आवाज और चेहरे के भाव उनके अभिनय की पहचान थे। इसी वजह से उन्हें पर्दे पर ‘जेंटलमैन विलेन’ के तौर पर पहचान मिली।

उनका अभिनय अंदाज उस दौर के पारंपरिक खलनायकों से अलग था। वह कम संवाद और संयमित हाव-भाव के जरिए ही दर्शकों के मन में अपने किरदार का खौफ पैदा कर देते थे।

संपन्न परिवार में हुआ था जन्म

के. एन. सिंह का जन्म 1 सितंबर 1908 को उत्तराखंड के देहरादून में एक शिक्षित और संपन्न परिवार में हुआ था। उनके पिता चंडी प्रसाद सिंह प्रसिद्ध आपराधिक मामलों के वकील होने के साथ कुछ रियासतों के राजा भी थे।

के. एन. सिंह भी पिता की तरह कानून की पढ़ाई कर बैरिस्टर बनना चाहते थे। हालांकि, एक कातिल को उनके पिता द्वारा कानून के जरिए बचाए जाने की घटना ने उनके भीतर इस पेशे के प्रति पैदा हुआ जुनून हमेशा के लिए खत्म कर दिया।

कारोबार में आजमाया हाथ, लेकिन नहीं मिली स्थायी सफलता

पिता चाहते थे कि पढ़ाई पूरी करने के बाद के. एन. सिंह जल्द अपने पैरों पर खड़े हों। इसके लिए उन्होंने कई तरह के काम किए। वह लाहौर गए और वहां प्रिंटिंग प्रेस स्थापित की। इसके अलावा राजा-रजवाड़ों को पालने के लिए जंगली जानवरों की आपूर्ति की, चाय बागानों में काम करने वालों के लिए विशेष प्रकार के जूते बनवाए और सेना के लिए खुखरी की आपूर्ति भी की।

शुरुआत में उनके ये कारोबार सफल रहे, लेकिन आगे चलकर इनमें से कोई भी व्यवसाय ज्यादा फल-फूल नहीं सका। लगातार मिल रही असफलताओं का असर उनके आत्मविश्वास पर भी पड़ा और पिता उनके भविष्य को लेकर चिंतित रहने लगे।

निजी जिंदगी में भी आए उतार-चढ़ाव

वर्ष 1930 में उनके पिता ने उनकी शादी मेरठ के फौलादा गांव की आनंद देवी से कर दी। हालांकि, कुछ समय बाद बीमारी के कारण उनकी पत्नी का निधन हो गया।

के. एन. सिंह अभिनय के साथ-साथ बेहतरीन एथलीट भी थे। 1935 के बर्लिन ओलंपिक के लिए उनका चयन लगभग तय था, लेकिन बहन की बीमारी के कारण वह प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं ले सके। बहन को देखने के लिए उन्हें उस समय कलकत्ता जाना पड़ा। इसी दौरान उनकी मुलाकात पृथ्वीराज कपूर से हुई, जिन्होंने उन्हें निर्देशक देबाकी बोस से मिलवाया।

‘सुनहरा संसार’ से शुरू हुआ अभिनय सफर

के. एन. सिंह का अभिनय करियर वर्ष 1936 में आई फिल्म ‘सुनहरा संसार’ से शुरू हुआ। इस फिल्म में उन्होंने डॉक्टर की भूमिका निभाई थी। इसके बाद वह मुंबई आ गए और वर्ष 1937 की सुपरहिट फिल्म ‘बागवान’ से खलनायक के रूप में अपनी पहचान बनाई।

इसके बाद उन्होंने एक के बाद एक कई फिल्मों में खलनायक और चरित्र कलाकार के तौर पर काम किया। उनकी अभिनय क्षमता और अलग अंदाज ने उन्हें हिंदी सिनेमा में लंबे समय तक प्रासंगिक बनाए रखा।

200 से अधिक फिल्मों में किया अभिनय

पांच दशक के अपने लंबे करियर में के. एन. सिंह ने 200 से अधिक हिंदी फिल्मों में अभिनय किया। उनकी प्रमुख फिल्मों में ‘बागबान’ (1938), ‘बरसात’ (1949), ‘आवारा’ (1951), ‘बाजी’ (1951), ‘जाल’ (1952), ‘सीआईडी’ (1956), ‘हावड़ा ब्रिज’ (1958), ‘चलती का नाम गाड़ी’ (1958), ‘तीसरी मंजिल’ (1966), ‘हाथी मेरे साथी’ (1971) और ‘डॉन’ (1978) शामिल हैं।

उनकी आखिरी फिल्म ‘दानवीर’ थी, जो 20 सितंबर 1996 को रिलीज हुई थी।

छह भाई-बहनों में सबसे बड़े थे के. एन. सिंह

व्यक्तिगत जीवन की बात करें तो के. एन. सिंह छह भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। उनकी दूसरी पत्नी प्रवीण पाल थीं, जो खुद भी सफल चरित्र अभिनेत्री थीं। दोनों की कोई संतान नहीं थी। ऐसे में उन्होंने अपने छोटे भाई विक्रम सिंह के बेटे पुष्कर सिंह को गोद लिया। पुष्कर सिंह आगे चलकर टेलीविजन धारावाहिकों के निर्माता बने।

जीवन के अंतिम चरण में के. एन. सिंह की आंखों की रोशनी चली गई थी। 31 जनवरी 2000 को मुंबई में उनका निधन हो गया। अपने संयमित अभिनय, गहरी आवाज और खौफ पैदा करने वाले अंदाज के कारण के. एन. सिंह हिंदी सिनेमा के उन खलनायकों में हमेशा याद किए जाते हैं, जिन्होंने बिना शोर किए पर्दे पर अपनी अलग छाप छोड़ी।

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