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12 साल बाद शुरू हुई मां नंदा की बड़ी जात, कैलाश की ओर रवाना हुईं नंदा की डोलियां

गोपेश्वर, 5 सितंबर। 12 साल के लंबे इंतजार के बाद शनिवार को वह भावुक घड़ी आई, जब मां नंदा के मायके से कैलाश के लिए उनकी डोली विदा हुई। ढोल-दमाऊं की थाप, पारंपरिक जागरों की गूंज और ‘जय मां नंदा’ के जयकारों के बीच कुरुड़ के सिद्धपीठ मंदिर से मां नंदा की बड़ी जात शुरू हुई। डोली के आगे बढ़ते ही श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं। खास तौर पर ध्याणियों ने मां नंदा को अपनी बेटी मानकर उनकी विदाई के समय भावनाओं पर काबू नहीं रखा।

किसी ने हाथ जोड़कर मां नंदा से परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की तो किसी ने बेटी की तरह उन्हें विदा करते हुए मंगल गीत गाए। इस भावुक दृश्य के बीच नंदा की डोली हिमालय की ओर अपनी पौराणिक यात्रा पर आगे बढ़ गई।

तीन नंदा डोलियां पौराणिक यात्रा मार्गों से रवाना

सिद्धपीठ कुरुड़ से मां राजराजेश्वरी बधाण की नंदा डोली, कुरुड़-दशोली की नंदा डोली और बंड क्षेत्र की नंदा डोली अपने-अपने पौराणिक यात्रा मार्गों से हिमालय की ओर रवाना हुईं। इन डोलियों के साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालु भी यात्रा पर निकले।

मां नंदा की बड़ी जात शुरू होते ही सीमांत जनपद चमोली एक बार फिर मां नंदा की भक्ति में डूब गया। गांवों से लेकर यात्रा मार्ग तक श्रद्धा और आस्था का वातावरण दिखाई दिया।

बेटी की विदाई की तरह भावुक है नंदा की विदाई

पहाड़ की लोक परंपरा में मां नंदा को बेटी का स्वरूप माना जाता है। गांव उनका मायका और कैलाश उनका ससुराल माना जाता है। इसी कारण नंदा की डोली की विदाई केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि बेटी को मायके से विदा करने की सदियों पुरानी भावनात्मक परंपरा है।

डोली के प्रस्थान के समय श्रद्धा के साथ विरह का भाव भी पूरे वातावरण में दिखाई दिया। ध्याणियों के लिए यह क्षण विशेष रूप से भावुक रहा। डोली आगे बढ़ती रही और पीछे मायके की आंखों में आंसू रह गए।

जागर और लोकगीतों से गूंजा कुरुड़ मंदिर

कुरुड़ मंदिर परिसर में मां नंदा के पौराणिक जागर और लोकगीत गूंजते रहे। ढोल-दमाऊं की थाप के साथ दांकुड़ी, झोड़ा और चांचरी की मधुर लहरियों ने माहौल को भक्तिमय बना दिया। मां नंदा की डोली की एक झलक पाने और उनका आशीर्वाद लेने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचे।

मां नंदा की बड़ी जात के साथ पहाड़ की लोक संस्कृति भी जीवंत हो उठी है। गांवों से लेकर डांडी-कांठी तक जागरों की गूंज सुनाई दे रही है। बुजुर्गों के साथ युवा और बच्चे भी यात्रा में शामिल होकर इस सदियों पुरानी परंपरा के साक्षी बन रहे हैं।

295 किलोमीटर की यात्रा के बाद होमकुंड में पड़ाव

मां नंदा की बड़ी जात करीब 295 किलोमीटर लंबे पौराणिक यात्रा मार्ग से होते हुए हिमालय की ओर बढ़ेगी। यात्रा के विभिन्न पड़ावों पर पूजा-अर्चना और पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान किए जाएंगे।

20 सितंबर को यात्रा होमकुंड पहुंचेगी। यहां चैसिंग्या खाडू को कैलाश की ओर विदा किया जाएगा। इसके बाद वापसी यात्रा शुरू होगी और 30 सितंबर को कुरुड़ पहुंचने के साथ बड़ी जात का समापन होगा।

लोक आस्था और संस्कृति का अनूठा पर्व

12 वर्ष के अंतराल में आयोजित होने वाली मां नंदा की बड़ी जात उत्तराखंड की लोक आस्था और संस्कृति का अनूठा पर्व है। इस यात्रा में धार्मिक आस्था के साथ पहाड़ की सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराएं भी गहराई से जुड़ी हैं। नंदा के मायके से लेकर हिमालय तक यात्रा के हर पड़ाव पर लोगों की भावनाएं मां नंदा से जुड़ी रहती हैं।

अब नंदा की डोली कैलाश की ओर बढ़ चली है। पीछे रह गया है मायका, ध्याणियों की नम आंखें और बेटी नंदा के फिर लौटने की उम्मीद। 12 साल बाद शुरू हुई इस यात्रा ने एक बार फिर यह भाव जीवंत कर दिया कि पहाड़ के लिए मां नंदा केवल आराध्य देवी नहीं, बल्कि हर घर की बेटी हैं।

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