हरिद्वार, 23 जुलाई। कांवड़ यात्रा 2026: श्रावण मास में शुरू होने वाली कांवड़ यात्रा को लेकर श्री अखंड परशुराम अखाड़े के पंडित अधीर कौशिक ने शिवभक्तों से धार्मिक परंपराओं, मर्यादाओं और अनुशासन का पालन करने की अपील की है। गुरुवार को पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि कांवड़ यात्रा केवल आस्था का पर्व नहीं, बल्कि संयम, पवित्रता और सनातन संस्कृति के प्रति समर्पण का प्रतीक भी है।
उन्होंने कहा कि श्रद्धालुओं को यात्रा की शुरुआत घर से बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लेकर करनी चाहिए। बहन के हाथों तिलक और आरती के बाद यात्रा पर निकलना शुभ माना जाता है। हरिद्वार पहुंचकर सबसे पहले मां गंगा का पूजन करें और संकल्प लेकर गंगाजल कांवड़ में स्थापित करें।
शुचिता और सात्विक जीवनशैली अपनाने की सलाह
पंडित अधीर कौशिक ने बताया कि कांवड़ उठाने के बाद यदि किसी कारणवश लघुशंका करनी पड़े तो हाथ, पैर और मुंह धोने के बाद ही कांवड़ दोबारा उठानी चाहिए। यदि शौच के लिए जाना पड़े तो स्नान और धूप-दीप के बाद ही यात्रा आगे बढ़ाई जाए।
उन्होंने कहा कि पूरी यात्रा के दौरान किसी भी प्रकार का नशा पूरी तरह वर्जित है। शिवभक्तों को केवल सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए तथा जहां भी भंडारे में प्रसाद लें, वहां अपनी श्रद्धानुसार दान अवश्य करें। उन्होंने यह भी कहा कि कांवड़ को गुलर के पेड़ के नीचे से नहीं ले जाना चाहिए।
जलाभिषेक के बाद भी निभाएं धार्मिक परंपराएं
उन्होंने बताया कि जलाभिषेक के बाद घर लौटने पर बहन से आरती कराकर और नेग देकर घर में प्रवेश करना शुभ माना जाता है। कांवड़ खोलने से पहले भगवान सत्यनारायण की कथा कराई जाए तथा पहला धागा बहन या किसी कन्या के हाथों खुलवाया जाए।
धार्मिक गरिमा बनाए रखने की अपील
पंडित अधीर कौशिक ने कहा कि कांवड़ यात्रा के दौरान देवी-देवताओं का स्वरूप धारण कर फिल्मी गीतों पर नृत्य करना धार्मिक दृष्टि से उचित नहीं है। उन्होंने श्रद्धालुओं से सनातन परंपराओं से जुड़े व्यापारियों से कांवड़ सामग्री खरीदने, राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान बनाए रखने तथा अपनी कांवड़ पर भगवा ध्वज लगाने की अपील की।
उन्होंने यह भी कहा कि यात्रा भगवान शिव के भजनों, “बम-बम भोले” के जयकारों, अनुशासन और श्रद्धा के साथ पूरी की जानी चाहिए। इससे यात्रा का आध्यात्मिक महत्व और धार्मिक पुण्य दोनों बढ़ते हैं।
इस अवसर पर आचार्य पवन शास्त्री, आचार्य विष्णु शास्त्री, स्वामी रुद्रानंद, स्वामी कार्तिक गिरी, ऋषि शर्मा और दिनेश बाली सहित अनेक धर्माचार्य उपस्थित रहे।


