हरिद्वार, 24 जुलाई। उत्तराखंड की कोसी नदी बेसिन में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव आने वाले दशकों में जल संसाधनों पर गंभीर संकट पैदा कर सकता है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रुड़की और जी.बी. पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान के संयुक्त अध्ययन में यह चेतावनी दी गई है कि बढ़ता तापमान, घटता भूजल पुनर्भरण और सूखे की बढ़ती घटनाएं कुमाऊँ क्षेत्र की जल सुरक्षा, कृषि, पेयजल आपूर्ति और हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बड़ी चुनौती बन सकती हैं।
शोधकर्ताओं के अनुसार यदि वर्तमान जलवायु परिवर्तन की प्रवृत्ति जारी रही तो इस शताब्दी के अंत तक कोसी नदी बेसिन में जल उपलब्धता में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की जा सकती है। इसका सीधा असर लाखों लोगों की आजीविका, खेती और प्राकृतिक जल स्रोतों पर पड़ेगा। अध्ययन इस बात की ओर भी संकेत करता है कि समय रहते प्रभावी जल संरक्षण उपाय नहीं अपनाए गए तो भविष्य में जल संकट और अधिक गंभीर रूप ले सकता है।
अध्ययन में शामिल आईआईटी रुड़की के डॉ. बी. दास, डॉ. एस. एन. तथा जी.बी. पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान के डॉ. संदीपन मुखर्जी ने बताया कि वर्ष 2100 तक अधिकतम तापमान में उल्लेखनीय वृद्धि होने की संभावना है। वर्तमान में जहां अधिकतम तापमान लगभग 38.4 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया जाता है, वहीं मध्यम उत्सर्जन परिदृश्य में यह बढ़कर 41.6 डिग्री सेल्सियस और उच्च उत्सर्जन परिदृश्य में 43.2 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि तापमान में वृद्धि के कारण वाष्पोत्सर्जन की प्रक्रिया तेज होगी, जिससे मिट्टी और वनस्पतियों से अधिक मात्रा में नमी का नुकसान होगा। इसका परिणाम जल संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव के रूप में सामने आएगा और वर्ष भर उपलब्ध रहने वाले जल स्रोतों की क्षमता प्रभावित होगी।
शोध के निष्कर्षों के अनुसार वर्ष 2100 तक कोसी नदी बेसिन की कुल जल उपलब्धता में 4 से 7 प्रतिशत तक कमी आने की आशंका है। इसके साथ ही वाष्पोत्सर्जन में लगभग 13 प्रतिशत वृद्धि और भूजल पुनर्भरण में 20 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज हो सकती है। अध्ययन यह भी बताता है कि सतही अपवाह में लगभग 20 प्रतिशत की वृद्धि होगी, जिससे वर्षा का पानी तेजी से बह जाएगा और भूजल स्तर को पुनर्भरित होने का पर्याप्त अवसर नहीं मिलेगा।
शोधकर्ताओं ने भविष्य में सूखे की घटनाओं के अधिक बार और लंबे समय तक बने रहने की भी आशंका व्यक्त की है। ऐसी स्थिति में प्राकृतिक जल स्रोत, पारंपरिक नौले-धारे, कुएं, सिंचाई व्यवस्था और ग्रामीण क्षेत्रों की पेयजल आपूर्ति पर व्यापक असर पड़ सकता है। कृषि उत्पादन में गिरावट के साथ स्थानीय समुदायों की जल आवश्यकताओं को पूरा करना भी चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।
अध्ययन में हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र पर संभावित प्रभावों को भी गंभीर बताया गया है। जल संसाधनों में कमी से जैव विविधता, वनस्पति और स्थानीय पर्यावरणीय संतुलन प्रभावित हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि पर्वतीय क्षेत्रों में जल संरक्षण की दीर्घकालिक रणनीति अपनाना अब अत्यंत आवश्यक हो गया है।
जल संकट से निपटने के लिए शोधकर्ताओं ने जलागम प्रबंधन को मजबूत करने, प्राकृतिक जल स्रोतों के पुनर्जीवन, मृदा एवं जल संरक्षण कार्यों को बढ़ावा देने, भूजल पुनर्भरण बढ़ाने तथा प्रकृति-आधारित समाधानों को प्राथमिकता देने की सिफारिश की है। उनका कहना है कि इन उपायों को प्रभावी ढंग से लागू कर कोसी नदी बेसिन की जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूलन क्षमता को मजबूत किया जा सकता है और भविष्य में संभावित जल संकट के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

