हरिद्वार, 20 अगस्त। धूम्रपान की लत छोड़ना लंबे समय से सिगरेट और बीड़ी का सेवन करने वाले लोगों के लिए चुनौतीपूर्ण होता है। निकोटीन की तलब के साथ धूम्रपान की आदत भी बनी रहती है। इसी मनोवैज्ञानिक तलब को कम करने के उद्देश्य से हरिद्वार स्थित ऋषिकुल आयुर्वेद कॉलेज में एक पहल शुरू की गई है। कॉलेज के अंगदतंत्र विभाग ने उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों, आयुर्वेदाचार्यों और शोधार्थियों के सहयोग से निकोटीन मुक्त हर्बल धूम्रपान दंडिका तैयार की है।
बीड़ी-सिगरेट के विकल्प के तौर पर हर्बल दंडिका
हर्बल दंडिका में तंबाकू और निकोटीन का इस्तेमाल नहीं किया गया है। चिकित्सकों के अनुसार इसका उद्देश्य धूम्रपान करने वाले व्यक्ति की आदत और मनोवैज्ञानिक तलब को धीरे-धीरे कम करने में मदद करना है। तंबाकू के स्थान पर तेंदु के पत्ते में शलकी, लाक्षा और मधुयेष्ठी समेत करीब 15 आयुर्वेदिक औषधियों का मिश्रण इस्तेमाल किया गया है।
आयुर्वेद में इसे धूमपान विधि के रूप में जाना जाता है। कॉलेज के विशेषज्ञों ने इसे प्राचीन आयुर्वेदिक सिद्धांतों और आधुनिक वैज्ञानिक शोध के आधार पर तैयार किया है।
चिकित्सकीय निगरानी में कराया जा रहा इस्तेमाल
ऋषिकुल आयुर्वेद कॉलेज के अंगदतंत्र विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. भावना मित्तल के अनुसार धूम्रपान छोड़ना कई लोगों के लिए आसान नहीं होता। इसी को ध्यान में रखते हुए औषधीय धूमपान दंडिका तैयार की गई है। इसमें तंबाकू के बजाय आयुर्वेदिक औषधियों का इस्तेमाल किया गया है और इसका प्रयोग चिकित्सकों की निगरानी में कराया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि पारंपरिक धूम्रपान की आदत में धुएं की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में हर्बल दंडिका के माध्यम से व्यक्ति की धूम्रपान की आदत को धीरे-धीरे कम करने का प्रयास किया जा रहा है।
सीटीआरआई में कराया गया पंजीकरण
शोधार्थी डॉ. प्रगति नेगी ने बताया कि शमन धूमपान को लेकर शोध किया जा रहा है। प्रयोग को वैज्ञानिक तरीके से आगे बढ़ाने के लिए इसे सेंट्रल क्लिनिकल ट्रायल रजिस्ट्री ऑफ इंडिया (सीटीआरआई) में पंजीकृत कराया गया है। कॉलेज प्रशासन की मदद से शोध को आगे बढ़ाया जा रहा है।
एक महीने में 15 लोगों ने कराया पंजीकरण
ऋषिकुल आयुर्वेद कॉलेज की ओपीडी में पिछले करीब एक महीने से धूम्रपान छोड़ने के इच्छुक लोगों को चिकित्सकों की निगरानी में हर्बल स्मोकिंग स्टिक का इस्तेमाल कराया जा रहा है। शोधार्थियों के अनुसार शुरुआती परिणाम उत्साहजनक बताए जा रहे हैं।
अब तक 15 लोग धूम्रपान की लत छोड़ने के लिए पंजीकरण करा चुके हैं। कॉलेज की ओर से धूम्रपान छोड़ने के इच्छुक लोगों से ओपीडी में संपर्क करने की अपील की गई है। उपचार प्रक्रिया में चिकित्सकीय सलाह और निगरानी को प्राथमिकता दी जा रही है।
40 साल से धूम्रपान कर रहे व्यक्ति ने बताई अनुभव की कमी
हर्बल दंडिका का इस्तेमाल कर रहे स्थानीय निवासी रामकुमार ने बताया कि वह करीब 40 वर्षों से धूम्रपान की आदत से परेशान थे। उन्होंने कई बार धूम्रपान छोड़ने का प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिली।
रामकुमार के अनुसार, हर्बल दंडिका के इस्तेमाल के बाद उन्हें धूम्रपान करने की इच्छा में कमी महसूस हुई है। उन्हें उम्मीद है कि धीरे-धीरे वह तंबाकू की लत से छुटकारा पा सकेंगे।
ऐसे होता है पंजीकरण और स्वास्थ्य परीक्षण
ऋषिकुल आयुर्वेद कॉलेज की ओपीडी में धूम्रपान छोड़ने के इच्छुक व्यक्ति को सबसे पहले काउंटर पर जाकर 10 रुपये की सरकारी फीस देकर पर्ची बनवानी होती है। इसके बाद चिकित्सक काउंसलिंग करते हैं।
काउंसलिंग के दौरान व्यक्ति की उम्र, धूम्रपान की अवधि, ब्रीथ टेस्ट, वजन, ब्लड शुगर, ब्लड प्रेशर और थायरॉयड सहित स्वास्थ्य संबंधी जानकारियां ली जाती हैं। जांच और चिकित्सकीय मूल्यांकन के बाद डॉक्टर यह तय करते हैं कि संबंधित व्यक्ति के लिए हर्बल दंडिका का इस्तेमाल उपयुक्त है या नहीं।
इसके बाद ही चिकित्सकीय निगरानी में इसका प्रयोग कराया जाता है। विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि हर्बल दंडिका का इस्तेमाल बिना चिकित्सकीय सलाह के नहीं किया जाना चाहिए।
आयुर्वेदिक ज्ञान और आधुनिक शोध का प्रयास
ऋषिकुल आयुर्वेद कॉलेज की यह पहल प्राचीन आयुर्वेदिक ज्ञान को आधुनिक शोध पद्धति से जोड़ने का प्रयास है। शुरुआती परिणाम उत्साहजनक बताए जा रहे हैं, लेकिन इसके प्रभाव और दीर्घकालिक उपयोगिता को लेकर व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन अभी महत्वपूर्ण है।
शोधकर्ताओं के अनुसार अध्ययन को आगे भी जारी रखा जाएगा, ताकि धूम्रपान की लत छोड़ने वालों के लिए इस पद्धति की उपयोगिता का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जा सके।



