नई दिल्ली, 25 अगस्त: लोकसभा ने 6 अगस्त 2026 को भुगतान एवं निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 में संशोधन से संबंधित विधेयक पारित किया। इसके तहत यूपीआई और अन्य अधिसूचित इलेक्ट्रॉनिक भुगतानों पर बैंकों तथा अन्य भुगतान सेवा प्रदाताओं द्वारा मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर लगाए जाने पर मौजूद वैधानिक रोक समाप्त हो जाएगी। हालांकि, सरकार का कहना है कि इसका असर उपभोक्ताओं पर नहीं पड़ेगा और यूपीआई से भुगतान करना तथा भुगतान प्राप्त करना निशुल्क रहेगा।
बताया जा रहा है कि 2,000 रुपये तक के यूपीआई भुगतान निशुल्क रहेंगे, जबकि 2,000 रुपये से अधिक के लेन-देन पर बैंकों और अन्य भुगतान सेवा प्रदाताओं से एमडीआर लिया जा सकेगा। यह शुल्क भुगतान प्राप्तकर्ता यानी विक्रेता से वसूला जाएगा। हालांकि, एमडीआर की दर अभी निश्चित नहीं है। प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार, अधिक मूल्य वाले लेन-देन पर यह शुल्क 0.25 से 0.5 प्रतिशत के बीच हो सकता है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि छोटे विक्रेताओं और उपभोक्ताओं के लिए यूपीआई की सुविधा निशुल्क रहेगी।
यूपीआई शुल्क को लेकर सरकार का तर्क
सरकार की ओर से नियमों में बदलाव का तर्क यह दिया जा रहा है कि यूपीआई भले ही उपयोगकर्ताओं के लिए निशुल्क हो, लेकिन इसके संचालन की लागत किसी न किसी को वहन करनी पड़ती है। यूपीआई की व्यवस्था को बनाए रखने में बैंक, भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम यानी एनपीसीआई और भुगतान कंपनियां सर्वर, साइबर सुरक्षा तथा विस्तार पर खर्च करती हैं।
यूपीआई पर शुल्क लगाने के समर्थकों का कहना है कि इस बुनियादी ढांचे को सुरक्षित और भरोसेमंद बनाए रखने के लिए वित्तीय संसाधनों की जरूरत होती है। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा भी कह चुके हैं कि यूपीआई को सुरक्षित और भरोसेमंद बनाए रखने के लिए किसी न किसी को भुगतान करना ही पड़ेगा।
क्या यूपीआई सार्वजनिक हित की सेवा है?
अर्थशास्त्र में कुछ सेवाओं को गैर-प्रतिद्वंद्वी माना जाता है, यानी एक व्यक्ति के इस्तेमाल से दूसरे व्यक्ति के इस्तेमाल पर कोई बाधा नहीं आती। कुछ सेवाएं ऐसी भी होती हैं, जिन तक पहुंच को कीमत वसूलकर सीमित किया जा सकता है। इन्हें सार्वजनिक वस्तु की दूसरी श्रेणी में रखा जा सकता है।
यूपीआई इसी श्रेणी में आता है। यह प्रकृति से गैर-प्रतिद्वंद्वी है, लेकिन शुल्क लगाकर कुछ लोगों को इसके इस्तेमाल से बाहर रखा जा सकता है। आम तौर पर ऐसी सार्वजनिक सेवाएं समाज के लिए व्यापक रूप से लाभकारी होती हैं, लेकिन निजी क्षेत्र इनमें अपेक्षित निवेश नहीं करता। यूपीआई का विकास भी सरकार के निवेश और प्रयासों का परिणाम है।
इसलिए यूपीआई पर शुल्क लगाने का निर्णय लागत और लाभ के आधार पर किया जाना चाहिए। यदि किसी सेवा से मिलने वाले लाभ उसकी लागत की तुलना में काफी अधिक हैं और उसकी लागत बहुत ज्यादा नहीं है, तो उसे निशुल्क रखना अधिक लाभकारी हो सकता है।
निशुल्क यूपीआई से घट सकती है कारोबार की लागत
भारत में लंबे समय से लॉजिस्टिक लागत अधिक रही है, जिसके कारण भारतीय उत्पादों की वैश्विक प्रतिस्पर्धा प्रभावित होती रही। पिछले एक दशक से अधिक समय में लॉजिस्टिक लागत में महत्वपूर्ण कमी दर्ज की गई है। एनसीएईआर और डीपीआईआईटी के आंकड़ों के अनुसार, यह लागत 2014 में सकल घरेलू उत्पाद के करीब 9 प्रतिशत थी, जो अब घटकर लगभग 8 प्रतिशत रह गई है।
इस कमी में निशुल्क यूपीआई की भूमिका को भी महत्वपूर्ण माना जा सकता है। आज भारत में दुनिया के करीब 49 प्रतिशत ऑनलाइन लेन-देन होते हैं और इनमें बड़ी संख्या ऐसे लेन-देन की है, जिन पर उपभोक्ताओं से शुल्क नहीं लिया जाता।
यूपीआई का बुनियादी ढांचा भी सार्वजनिक हित की सेवा के रूप में देखा जा सकता है। जिस तरह सड़कें, पार्क, स्ट्रीट लाइट और कानून-व्यवस्था लोगों के जीवन को सुगम बनाते हैं, उसी तरह यूपीआई कारोबार को आसान बनाता है। सरकार का उद्देश्य व्यवसाय करने की सुगमता सुनिश्चित करना है और यूपीआई इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
देश में बेहतर सड़क और रेल नेटवर्क, नए गलियारे तथा अन्य सरकारी योजनाएं भी कारोबार को सुगम बनाने और लॉजिस्टिक लागत कम करने में मदद कर रही हैं।
क्या अमरीकी दबाव भी एक वजह है?
हाल ही में संयुक्त राज्य अमरीका व्यापार प्रतिनिधि द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट में भारत में यूपीआई लेन-देन के निशुल्क होने पर आपत्ति जताई गई थी। रिपोर्ट में शून्य एमडीआर नीति, रूपे कार्ड को बढ़ावा देने, रूपे क्रेडिट कार्ड को यूपीआई से जोड़ने, डाटा स्थानीयकरण के नियम और एनपीसीआई की यूपीआई एप्लिकेशन कंपनियों के लिए 30 प्रतिशत बाजार हिस्सेदारी की सीमा जैसे प्रावधानों को अमरीकी कंपनियों के लिए कारोबारी बाधाओं के रूप में बताया गया था।
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि भुगतान संबंधी संशोधन के पीछे अमरीकी दबाव भी एक कारण हो सकता है। उनका तर्क है कि यूपीआई ने अमरीकी कार्ड कंपनियों वीजा और मास्टरकार्ड के पारंपरिक कारोबारी मॉडल को प्रभावित किया है। ये कंपनियां विक्रेताओं से लेन-देन की राशि का 1 से 3 प्रतिशत तक शुल्क लेती हैं, जबकि यूपीआई के माध्यम से विक्रेताओं को क्यूआर कोड के जरिए बिना शुल्क भुगतान प्राप्त करने की सुविधा मिलती है।
एनपीसीआई के रूपे कार्ड ने इस प्रतिस्पर्धा को और बढ़ाया है। रूपे कार्ड और यूपीआई भुगतान पर एमडीआर नहीं होने के कारण विक्रेता अंतरराष्ट्रीय कार्ड की तुलना में यूपीआई को प्राथमिकता दे सकते हैं। रूपे क्रेडिट कार्ड को यूपीआई से जोड़े जाने के बाद अंतरराष्ट्रीय कार्ड कंपनियों के सामने प्रतिस्पर्धा और बढ़ी है।
गौरतलब है कि 2023 में रूपे क्रेडिट कार्ड की हिस्सेदारी करीब 3 प्रतिशत थी, जो अब बढ़कर 20 प्रतिशत हो गई है, जबकि इसके माध्यम से होने वाले भुगतान 40 प्रतिशत तक पहुंच चुके हैं। इन आंकड़ों से यह समझा जा सकता है कि अमरीकी कंपनियां यूपीआई के निशुल्क मॉडल को लेकर चिंतित क्यों हैं।
क्या यूपीआई से सरकार को भारी नुकसान हो रहा है?
यूपीआई पारिस्थितिकी तंत्र को संचालित करने में भारत सरकार वर्तमान में करीब 2,200 करोड़ रुपये खर्च कर रही है। वहीं, बैंकों और अन्य सेवा प्रदाताओं द्वारा साइबर सुरक्षा तथा विस्तार पर किया जाने वाला खर्च उनकी अपनी परिचालन लागत का हिस्सा है।
यूपीआई ने बैंकों के लिए लेन-देन को आसान बनाया है और उनकी लागत कम करने में भी मदद की है। इसके साथ ही बैंकों के लाभ में लगातार वृद्धि हुई है। महत्वपूर्ण बात यह भी है कि बैंकों की ओर से यूपीआई पर एमडीआर लगाने की मांग सामने नहीं आई है।
ऐसे में यूपीआई पर शुल्क लगाने के संभावित फायदे और नुकसान का व्यापक आकलन जरूरी है। यूपीआई केवल भुगतान का माध्यम नहीं, बल्कि भारत के डिजिटल और कारोबारी ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। इसलिए शुल्क संबंधी किसी भी बदलाव का असर केवल भुगतान व्यवस्था पर नहीं, बल्कि छोटे विक्रेताओं, कारोबार की लागत और देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।



