पौड़ी गढ़वाल, 23 अगस्त। दिल्ली भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष विनोद बछेती ने कहा कि गढ़वाली और कुमाऊंनी केवल बोलचाल की भाषाएं नहीं, बल्कि उत्तराखंड की लोक संस्कृति, परंपरा और पहचान की मजबूत आधारशिला हैं। बदलते दौर में इन लोक भाषाओं का संरक्षण बेहद जरूरी हो गया है। यदि नई पीढ़ी को अपनी मातृभाषा से नहीं जोड़ा गया तो आने वाले एक-दो दशकों में इनके अस्तित्व पर गंभीर संकट खड़ा हो सकता है।
मातृभूमि और समाज के प्रति जिम्मेदारी जरूरी
दिल्ली भाजपा में प्रदेश उपाध्यक्ष बनने के बाद पहली बार अपने पैतृक गांव पहुंचे विनोद बछेती ने रविवार को जिला मुख्यालय पौड़ी में पत्रकारों से बातचीत की। उन्होंने कहा कि राजनीतिक और सामाजिक व्यस्तताओं के बावजूद प्रत्येक व्यक्ति का अपनी मातृभूमि और समाज के प्रति दायित्व होता है।
बछेती ने बताया कि वह हर दो माह में अपने पैतृक गांव पहुंचकर स्थानीय लोगों से संवाद करते हैं। इस दौरान क्षेत्र की समस्याओं और आवश्यकताओं को समझने का प्रयास किया जाता है।
दिल्ली-एनसीआर में चल रहीं भाषा की कक्षाएं
विनोद बछेती ने बताया कि गढ़वाली-कुमाऊंनी भाषा के संरक्षण को लेकर दिल्ली-एनसीआर में भी लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। वर्तमान में करीब 52 स्थानों पर गढ़वाली और कुमाऊंनी भाषा की कक्षाएं संचालित की जा रही हैं। इन कक्षाओं के माध्यम से नई पीढ़ी के बच्चों को अपनी लोक भाषाओं से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि किसी भी समाज की पहचान उसकी भाषा और संस्कृति से होती है। भाषा कमजोर होने पर धीरे-धीरे संस्कृति और परंपराओं पर भी इसका प्रभाव पड़ता है। इसलिए घरों में अभिभावकों को बच्चों से गढ़वाली और कुमाऊंनी में संवाद करना चाहिए। विद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं के स्तर पर भी लोक भाषाओं को बढ़ावा देना जरूरी है।
सामूहिक प्रयासों से होगा संरक्षण
बछेती ने कहा कि लोक भाषाओं के संरक्षण की जिम्मेदारी केवल सरकार या किसी संस्था की नहीं है। समाज के प्रत्येक व्यक्ति को अपने स्तर से पहल करनी होगी। सामूहिक प्रयासों से ही आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों, भाषा और संस्कृति से मजबूती से जोड़ा जा सकता है।


