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आवाहन अखाड़े ने महानिर्वाणी गुट को दिया समर्थन, अखाड़ा परिषद की वैधता और जूना अखाड़े की भूमिका पर उठाए सवाल

हरिद्वार, 25 जुलाई। अखाड़ों की व्यवस्था और अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद की वैधता को लेकर चल रहा विवाद एक बार फिर गहरा गया है। श्री शंभू पंचदशनाम आवाहन अखाड़ा से जुड़े श्रीमहंत गोपाल गिरी, मढ़ी रिद्धिनाथी गद्दी खालसा ने प्रेस को जारी बयान में महानिर्वाणी गुट के समर्थन की घोषणा करते हुए हरि गिरी और जूना अखाड़े की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने परिषद के गठन, परंपराओं और संचालन को लेकर कई महत्वपूर्ण दावे भी किए।

महानिर्वाणी गुट के समर्थन का किया ऐलान

श्रीमहंत गोपाल गिरी ने कहा कि आवाहन अखाड़े के अधिकांश संत महानिर्वाणी अखाड़े के साथ हैं। उन्होंने बताया कि उन्होंने स्वयं भी सैकड़ों साधु-संतों के साथ महानिर्वाणी गुट को अपना समर्थन देने का निर्णय लिया है। उनका कहना है कि अखाड़ों की परंपराओं और मूल व्यवस्था को बनाए रखने के लिए यह कदम आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि अखाड़ा परिषद की वास्तविक संरचना वही मानी जानी चाहिए, जिसमें शंभू दल और रामा दल दोनों के प्रतिनिधियों को अध्यक्ष और महामंत्री जैसे प्रमुख पदों पर उचित प्रतिनिधित्व मिले।

अखाड़ों की वरिष्ठता पर रखा पक्ष

गोपाल गिरी ने दावा किया कि श्री शंभू पंचदशनाम आवाहन अखाड़ा वर्ष 547 ईस्वी का सबसे प्राचीन नागा संन्यासी अखाड़ा है। उन्होंने कहा कि अखाड़ों की वरिष्ठता संख्या या आकार के आधार पर नहीं, बल्कि उनकी परंपरा, इतिहास और प्राचीनता के आधार पर तय होती है।

उन्होंने आरोप लगाया कि जूना अखाड़ा स्वयं को सबसे बड़ा और वरिष्ठ अखाड़ा साबित करने का प्रयास कर रहा है, जबकि यह स्थापित परंपराओं के अनुरूप नहीं है।

2001 से 2009 के विवाद का किया उल्लेख

श्रीमहंत गोपाल गिरी ने बताया कि वर्ष 2001 से 2009 के बीच आवाहन और जूना अखाड़े के बीच विवाद चला। उनके अनुसार वर्ष 2003 में त्र्यंबकेश्वर में आनंद अखाड़े के श्रीमहंत सागरानंद सरस्वती के नेतृत्व में निरंजनी, महानिर्वाणी, आनंद, नया उदासीन, बड़ा उदासीन, निर्मल, अग्नि और आवाहन अखाड़ों ने अलग परिषद का गठन किया था तथा जूना अखाड़े का बहिष्कार किया गया था।

उन्होंने दावा किया कि वर्ष 2004 के उज्जैन कुंभ के दौरान जूना अखाड़े ने माफी मांगने के बाद परिषद में पुनः वापसी की थी।

हरि गिरी और परिषद की कार्यप्रणाली पर सवाल

गोपाल गिरी ने आरोप लगाया कि इसके बाद परिषद की कार्यप्रणाली में नियमों की अनदेखी शुरू हुई और जूना अखाड़ा लंबे समय से मंत्री पद पर बना हुआ है। उन्होंने कहा कि जिन संतों को पहले परिषद से बाहर किया गया था, आज उन्हीं का समर्थन लिया जा रहा है। यदि उस समय की कार्रवाई उचित थी तो उसकी निष्पक्ष समीक्षा क्यों नहीं कराई गई।

उन्होंने यह भी कहा कि किसी एक अखाड़े को दूसरे अखाड़े की जांच करने का अधिकार नहीं होना चाहिए। ऐसा करने से संत समाज में अनावश्यक विवाद और भ्रम की स्थिति पैदा होती है। उन्होंने अखाड़ों की परंपराओं, संतों की गरिमा और परिषद की निष्पक्षता बनाए रखने पर जोर दिया।

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