कांतिलाल मांडोत
देश में मानसून एक बार फिर अपने रौद्र रूप में दिखाई दे रहा है। उत्तर भारत से लेकर पश्चिम, मध्य और पूर्वोत्तर भारत तक बारिश ने सामान्य जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित कर दिया है। कहीं नदियां खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं तो कहीं शहरों में जलभराव ने परिवहन व्यवस्था ठप कर दी है। उत्तर प्रदेश में गंगा का पानी बिजनौर में बहसूमा-ठाकुरद्वारा राज्य मार्ग तक पहुंच गया है। पहाड़ों पर लगातार हो रही बारिश के कारण गंगा, घाघरा, सरयू सहित कई नदियां उफान पर हैं। बलिया में सरयू नदी के कटाव से मकान नदी में समा गए हैं और कई परिवारों के सामने विस्थापन का संकट खड़ा हो गया है।
भारतीय मौसम विभाग ने राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हिमाचल प्रदेश तथा पूर्वोत्तर के कई राज्यों में भारी से अति भारी बारिश का अलर्ट जारी किया है। कई स्थानों पर ऑरेंज और रेड अलर्ट लागू हैं। गुजरात और उत्तराखंड के कई जिलों में स्कूल-कॉलेज बंद कर दिए गए हैं ताकि बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
गुजरात इस समय सबसे अधिक प्रभावित राज्यों में शामिल है। बंगाल की खाड़ी में बने गहरे दबाव के असर से सूरत, खेड़ा, नडियाद तथा आसपास के इलाकों में लगातार मूसलाधार बारिश हो रही है। सूरत जिला प्रशासन ने राहत एवं बचाव की व्यापक तैयारियां शुरू कर दी हैं। निचले इलाकों से लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा रहा है। एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीमों को संवेदनशील क्षेत्रों में तैनात किया गया है। राहत शिविरों में भोजन, पेयजल और स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था की गई है। तेज हवाओं की आशंका को देखते हुए बड़े होर्डिंग, कमजोर ढांचों और अस्थायी शेड हटाए जा रहे हैं। हाईमास्ट लाइटों को सुरक्षित स्थिति में लाया गया है और निर्माणाधीन परियोजनाओं पर विशेष निगरानी रखी जा रही है।
सूरत महानगरपालिका ने नागरिकों से अपील की है कि वे अनावश्यक रूप से घरों से बाहर न निकलें, पेड़ों और बिजली के खंभों से दूर रहें तथा अफवाहों पर विश्वास न करें। पशुपालकों से भी कहा गया है कि वे अपने पशुओं को ऐसे स्थान पर न बांधें, जहां बाढ़ की स्थिति में उन्हें नुकसान हो सकता है। जिला प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि एक अगस्त की सुबह तक का समय सबसे अधिक संवेदनशील माना गया है और सभी विभाग चौबीसों घंटे निगरानी कर रहे हैं।
सूरत के उद्योग क्षेत्रों में हालात बेहद चिंताजनक हैं। जुलाई के पहले सप्ताह में आई बाढ़ से कई औद्योगिक इकाइयों में आठ से तीस फीट तक पानी भर गया था। करोड़ों रुपये की मशीनरी, कच्चा माल, तैयार उत्पाद, विद्युत उपकरण, दस्तावेज और फर्नीचर नष्ट हो गए। इसके बाद जुलाई के अंतिम सप्ताह में हुई बारिश ने उद्योगों की मुश्किलें और बढ़ा दीं। उद्योगपतियों का कहना है कि प्रत्येक इकाई को दस से पंद्रह लाख रुपये अथवा उससे अधिक का नुकसान हुआ है। इसी कारण उन्होंने नगर प्रशासन से आगामी दो वर्षों का संपत्ति कर माफ करने की मांग की है। बाढ़ से प्रभावित उद्योगपतियों ने अपनी पीड़ा सीधे महापौर और नगर प्रशासन के समक्ष रखी तथा राहत पैकेज की मांग दोहराई।
उत्तर प्रदेश में भले ही मैदानों में मानसून कुछ कमजोर पड़ा हो, लेकिन पहाड़ी क्षेत्रों में लगातार हो रही वर्षा का असर नदियों पर साफ दिखाई दे रहा है। गंगा, घाघरा और सरयू जैसी नदियों का जलस्तर लगातार बढ़ रहा है। कई जिलों में बाढ़ का खतरा मंडरा रहा है। राज्य के 24 जिलों में वर्षा का अलर्ट जारी किया गया है, जबकि ललितपुर, मिर्जापुर और सोनभद्र में भारी वर्षा की चेतावनी दी गई है।
उत्तराखंड में पिछले कई दिनों से रुक-रुककर वर्षा जारी है। बागेश्वर और रुद्रप्रयाग में स्कूल बंद कर दिए गए हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन और सड़क अवरोध की आशंका बनी हुई है। हिमाचल प्रदेश में भी कांगड़ा सहित कई जिलों में तेज बारिश के कारण जनजीवन प्रभावित हुआ है और मौसम विभाग ने आगामी दिनों तक मानसून सक्रिय रहने की संभावना जताई है।
बिहार में भी मानसून पूरी तरह सक्रिय है। 25 जिलों में तेज हवा, वर्षा और आकाशीय बिजली का अलर्ट जारी किया गया है। प्रशासन लोगों से खुले स्थानों में जाने से बचने और मौसम संबंधी चेतावनियों का पालन करने की अपील कर रहा है। मध्य प्रदेश में तीन मजबूत मानसूनी तंत्र सक्रिय होने के कारण पश्चिमी हिस्सों में अगले दो दिनों तक भारी बारिश की संभावना व्यक्त की गई है।
दूसरी ओर पश्चिमी राजस्थान में मौसम का बिल्कुल अलग रूप देखने को मिल रहा है। जैसलमेर और बाड़मेर में पश्चिमी हवाओं के कारण तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच गया है। यह स्थिति दर्शाती है कि एक ही समय में देश के अलग-अलग हिस्सों में मौसम की चरम परिस्थितियां मौजूद हैं।
पूर्वोत्तर भारत, विशेषकर असम में बाढ़ की स्थिति अभी भी पूरी तरह सामान्य नहीं हो सकी है। लगातार बारिश और नदियों के उफान के कारण हजारों गांव प्रभावित हुए हैं। अनेक लोगों को राहत शिविरों में शरण लेनी पड़ी है। इस वर्ष की बाढ़ में कई लोगों की जान जा चुकी है और लाखों नागरिक प्रभावित हुए हैं। बड़ी संख्या में कृषि भूमि जलमग्न हो गई है, पशुधन का नुकसान हुआ है तथा सड़कें, पुल और अन्य सार्वजनिक ढांचे क्षतिग्रस्त हुए हैं। बाढ़ के कारण शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका पर भी गहरा असर पड़ा है। प्रशासन और राहत एजेंसियां लगातार बचाव कार्यों में जुटी हैं, लेकिन चुनौती अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।
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देश के अनेक हिस्सों से सामने आ रही तस्वीरें स्पष्ट संकेत देती हैं कि जलवायु परिवर्तन के दौर में मौसम की चरम घटनाएं अधिक गंभीर होती जा रही हैं। ऐसे समय में केवल सरकारी तैयारियां पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि नागरिकों की सतर्कता भी उतनी ही आवश्यक है। मौसम विभाग और प्रशासन द्वारा जारी चेतावनियों का पालन करना, अनावश्यक यात्रा से बचना, जलभराव वाले क्षेत्रों में वाहन न ले जाना, नदी-नालों के किनारे नहीं जाना, बिजली के खंभों और पेड़ों से दूरी बनाए रखना तथा बच्चों और बुजुर्गों का विशेष ध्यान रखना प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है।
मानसून जीवनदायिनी वर्षा लेकर आता है, लेकिन लापरवाही इसे बड़ी त्रासदी में बदल सकती है। यदि प्रशासन की तैयारी और जनता की सावधानी साथ-साथ चले तो प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले जान-माल के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। यही समय है जब सतर्कता, संयम और सामूहिक जिम्मेदारी को सबसे बड़ी सुरक्षा ढाल बनाया जाए।



