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घर की रखवाली से परिवार के सदस्य तक… ‘फर बेबी’ बने पालतू पशु, बदल रही इंसानियत की तस्वीर

कांतिलाल मांडोत

कभी घर की रखवाली के लिए पाला जाने वाला कुत्ता और चूहे पकड़ने के लिए घर में रखी जाने वाली बिल्ली आज इंसानी परिवारों की भावनात्मक दुनिया का अहम हिस्सा बन चुके हैं। अब पालतू पशु केवल घर के सदस्य नहीं, बल्कि परिवार के उन सदस्यों की तरह देखे जाने लगे हैं, जिनके जन्मदिन मनाए जाते हैं, जिनके लिए विशेष कपड़े खरीदे जाते हैं और जिनकी सेहत, खान-पान तथा आराम पर हर महीने हजारों रुपये खर्च किए जाते हैं। बदलते दौर में कुत्ते-बिल्लियां अब ‘फर बेबी’ के रूप में पहचाने जा रहे हैं। यह बदलाव केवल शहरी जीवनशैली का हिस्सा नहीं है, बल्कि इसके पीछे मनुष्य और पशु के बीच बढ़ता भावनात्मक रिश्ता भी दिखाई देता है।

देश में पालतू पशु पालने का चलन तेजी से बढ़ रहा है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2025 में भारत में करीब 3.8 करोड़ पालतू पशु थे, जिनमें 90 प्रतिशत से अधिक कुत्ते थे। वर्ष 2026 में इनकी संख्या करीब 4.5 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। पेट ओनरशिप में हर साल करीब 15 प्रतिशत की वृद्धि इस बात का संकेत है कि भारतीय समाज में पशुओं के प्रति नजरिया बदल रहा है। अब पशुओं को केवल उपयोगिता की दृष्टि से देखने के बजाय उनके साथ भावनात्मक संबंध बनाने की प्रवृत्ति मजबूत हो रही है।

सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि इस बदलाव में नई पीढ़ी की भूमिका काफी बड़ी है। पहली बार पालतू पशु पालने वालों में करीब 70 प्रतिशत जेन-जी के होने की बात सामने आई है। देश के करीब 56 प्रतिशत लोग अपने पालतू पशु को परिवार का अभिन्न सदस्य मानते हैं, जबकि लगभग 11 प्रतिशत लोगों के पास चार या उससे अधिक पालतू पशु हैं। इसका अर्थ केवल इतना नहीं है कि लोग पशुओं पर अधिक पैसा खर्च कर रहे हैं, बल्कि यह भी है कि मनुष्य और पशु के बीच रिश्ते की परिभाषा बदल रही है।

आज महानगरों में पालतू पशुओं के लिए ब्यूटी पार्लर, डे-केयर, होटल, स्वास्थ्य बीमा, विशेष भोजन और चिकित्सकीय सुविधाएं उपलब्ध हैं। कई जगह उनके जन्मदिन और दूसरे खास अवसरों पर बाकायदा समारोह आयोजित किए जाते हैं। पालतू पशुओं के लिए विशेष कपड़ों का बाजार भी तेजी से बढ़ा है। अब लोग अपने कुत्तों के लिए त्योहारों, शादियों और पारिवारिक समारोहों के अनुरूप कपड़े खरीद रहे हैं। पांच हजार रुपये तक की शेरवानी और हाथ से बुने हुए लहंगे जैसे परिधान इस बदलती सोच की तस्वीर पेश करते हैं।

यह बदलाव पहली नजर में उपभोक्तावाद जैसा लग सकता है, लेकिन इसके भीतर पशु-जगत के प्रति बढ़ती संवेदना का एक सकारात्मक पक्ष भी है। जब कोई परिवार किसी पशु को अपने घर में लाकर उसकी जिम्मेदारी स्वीकार करता है, तो वह धीरे-धीरे पशु की जरूरतों, भावनाओं और स्वास्थ्य को समझना शुरू करता है। पशु को भोजन देना और उसे बांधकर रखना ही पर्याप्त नहीं रह जाता। उसकी बीमारी, टीकाकरण, स्वच्छता, मानसिक सक्रियता और सुरक्षा की चिंता भी परिवार की जिम्मेदारी बन जाती है।

यही सोच व्यापक स्तर पर पशु प्रेम को जन्म दे सकती है। जिस व्यक्ति ने अपने घर के पालतू पशु के दर्द को समझना सीखा है, उसके लिए सड़क पर घायल पड़े किसी जानवर की पीड़ा को नजरअंदाज करना भी मुश्किल हो सकता है। यही वह बिंदु है, जहां पालतू पशु पालने की संस्कृति केवल व्यक्तिगत शौक न रहकर सामाजिक संवेदना का माध्यम बन सकती है।

बदलती जीवनशैली भी इस परिवर्तन के पीछे एक बड़ा कारण है। महानगरों और तेजी से विकसित हो रहे शहरों में परिवार छोटे होते जा रहे हैं। अकेलेपन और व्यस्त जीवन के बीच पालतू पशु लोगों को भावनात्मक साथ देते हैं। यही वजह है कि बेंगलुरु जैसे शहरों में पेट केयर और प्रीमियम सेवाओं पर खर्च तेजी से बढ़ा है। जालंधर, लुधियाना, इंदौर और जयपुर जैसे शहरों में भी यह संस्कृति अब तेजी से दिखाई देने लगी है। टियर-2 और छोटे शहरों में पेट केयर ऑर्डर में सालाना करीब 96 प्रतिशत की वृद्धि इस बदलाव की पहुंच को स्पष्ट करती है।

पालतू पशुओं के भोजन और स्वास्थ्य से जुड़े उत्पादों की मांग में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। डॉग शैम्पू की बिक्री में करीब 600 प्रतिशत तक उछाल, ग्रेन-फ्री पेट फूड की मांग में 152 प्रतिशत वृद्धि, पेट सप्लीमेंट्स और वेलनेस उत्पादों में 42 प्रतिशत वृद्धि तथा डॉग आइसक्रीम की मांग में 245 प्रतिशत वृद्धि यह बताती है कि लोग अब पशुओं की देखभाल को गंभीरता से लेने लगे हैं। टियर-2 और छोटे शहरों में बर्ड फूड तथा रैबिट फूड की मांग बढ़ना भी महत्वपूर्ण संकेत है। यानी पशु प्रेम केवल कुत्ते और बिल्ली तक सीमित नहीं रह रहा।

इस परिवर्तन का सबसे सुंदर पक्ष पशुओं को खरीदने के बजाय गोद लेने की बढ़ती प्रवृत्ति है। सामाजिक जिम्मेदारी की भावना बढ़ने के साथ अनेक लोग सड़क पर रहने वाले या आश्रय गृहों में मौजूद पशुओं को अपनाने की ओर बढ़ रहे हैं। यह प्रवृत्ति और मजबूत हो तो पशु कल्याण के क्षेत्र में बड़ा बदलाव आ सकता है। किसी पशु को घर देना केवल एक जीव को आश्रय देना नहीं, बल्कि उसके जीवन को सम्मान देना है।

दुनिया के कई देशों में पशु क्रूरता के खिलाफ जागरूकता लंबे समय से सामाजिक आंदोलनों का हिस्सा रही है। भारत में भी पशु कल्याण और पशु अधिकारों को लेकर जागरूकता बढ़ रही है। सोशल मीडिया ने इस संवेदना को नई आवाज दी है। घायल पशु के इलाज से लेकर आवारा पशुओं को भोजन और आश्रय देने तक, अनेक लोग व्यक्तिगत स्तर पर पहल कर रहे हैं। नई पीढ़ी इस बदलाव की प्रमुख वाहक बन सकती है।

हालांकि, पशु पालना केवल फैशन या दिखावे का विषय नहीं होना चाहिए। किसी पशु को घर लाने का अर्थ उसकी पूरी जिंदगी की जिम्मेदारी स्वीकार करना है। जन्मदिन पर महंगा केक काटना या हजारों रुपये के कपड़े पहनाना तभी सार्थक है, जब उसके भोजन, स्वास्थ्य, सुरक्षा और सम्मान का भी ध्यान रखा जाए। पशु प्रेम की असली परीक्षा महंगी सेवाओं में नहीं, बल्कि उस जीव के प्रति जिम्मेदारी और करुणा में है।

आज जब दुनिया में हिंसा, असंवेदनशीलता और स्वार्थ की खबरें लगातार सामने आती हैं, तब किसी छोटे से जीव के प्रति मनुष्य का प्रेम उम्मीद जगाता है। पालतू पशु बोल नहीं सकते, अपनी तकलीफ शब्दों में नहीं बता सकते, लेकिन वे भावनाओं को समझते हैं और अपने तरीके से इंसान के साथ रिश्ता बनाते हैं। उनके प्रति संवेदनशील होना दरअसल मनुष्य के भीतर मौजूद करुणा को मजबूत करना है।

पालतू पशुओं को परिवार का अभिन्न सदस्य मानने की बढ़ती प्रवृत्ति इसलिए एक महत्वपूर्ण सामाजिक बदलाव है। यह केवल पेट केयर बाजार के बढ़ने की कहानी नहीं है। यह मनुष्य के नजरिए में बदलाव की कहानी है। घर में रहने वाले पशु से शुरू हुआ यह प्रेम यदि सड़क के पशु, पक्षियों और दूसरे जीवों तक पहुंचता है, तो इसका प्रभाव बहुत व्यापक होगा। तब पशु संरक्षण केवल कानून या संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं रहेगा, बल्कि समाज की सामूहिक संवेदना बनेगा।

पशुओं पर हजारों रुपये खर्च करना अपने आप में कोई उपलब्धि नहीं है, लेकिन किसी बेजुबान जीव के जीवन, स्वास्थ्य और सम्मान को महत्व देना निश्चित रूप से इंसानियत की उपलब्धि है। जेन-जी सहित नई पीढ़ी में पशु प्रेम की यह लौ यदि लगातार तेज होती रही, तो आने वाले समय में पशु-जगत के प्रति समाज का रवैया और मानवीय हो सकता है। आखिर किसी समाज की संवेदनशीलता का आकलन केवल इस बात से नहीं होता कि वह अपने लिए कितना सुख जुटाता है, बल्कि इससे भी होता है कि वह अपने से कमजोर और बोल न सकने वाले जीवों के साथ कैसा व्यवहार करता है। पालतू पशुओं के प्रति बढ़ता प्रेम इसी उम्मीद की रोशनी है कि इंसानियत अभी जिंदा है और आने वाली पीढ़ियां उसे और मजबूत कर सकती हैं।

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