अरविन्द मोहन
नई दिल्ली: ईरान और सऊदी अरब के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव के बीच नई दिल्ली में हुए ब्रिक्स सम्मेलन में दोनों देशों के बीच शांति संबंधी घोषणापत्र पर सहमति को एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धि के रूप में देखा गया। हालांकि, सम्मेलन शुरू होने से पहले ही ईरान और अमेरिका के बीच फिर तनाव बढ़ गया था। पश्चिम एशिया में बढ़ते संकट का असर तेल बाजार पर भी पड़ा और कच्चे तेल की कीमत में करीब 20 प्रतिशत तक उछाल आया।
होर्मुज एक बार फिर तेलवाहक जहाजों के लिए संकट का मार्ग बन गया। खाड़ी क्षेत्र में ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात समेत कई स्थानों को बमबारी का निशाना बनाए जाने की खबरें सामने आईं। इस घटनाक्रम में अमेरिका की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही और उसके जहाजों को भी निशाना बनाए जाने की खबर आई। ऐसे में पश्चिम एशिया का संकट अब केवल क्षेत्रीय सुरक्षा का विषय नहीं रह गया है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए भी गंभीर चुनौती बनता जा रहा है।
ब्रिक्स सम्मेलन के बीच पश्चिम एशिया का गहराता संकट
नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन में दुनिया के कई प्रमुख देश और उनके प्रतिनिधि शामिल हुए। ऐसे में यह मानना कठिन है कि सम्मेलन में मौजूद देशों को पश्चिम एशिया की घटनाओं और उनके आर्थिक प्रभावों की जानकारी नहीं रही होगी।
ईरान, रूस और चीन के साथ सऊदी अरब भी वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका रखता है। सम्मेलन में दूसरे देश पर हमले जैसे संवेदनशील और विवादास्पद मुद्दे पर ईरान और सऊदी अरब के बीच एक घोषणापत्र पर सहमति बनी। दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे संघर्षपूर्ण संबंधों को देखते हुए यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण था।
लेकिन दूसरी ओर सम्मेलन शुरू होने से पहले ईरान और अमेरिका के बीच तनाव ने पूरे पश्चिम एशिया में संकट को और गहरा कर दिया। इसका सीधा असर तेल की कीमतों पर पड़ा और कच्चे तेल की कीमत करीब 20 प्रतिशत ऊपर पहुंच गई।
होर्मुज के बाद लाल सागर भी बना चिंता का कारण
पश्चिम एशिया के संकट के बीच होर्मुज के साथ लाल सागर क्षेत्र भी तेल आपूर्ति के लिए चिंता का कारण बन रहा है। यमन के हुती विद्रोहियों ने बाब एल मांदेब द्वीप समेत कई नए द्वीपों और इलाकों पर कब्जा कर लिया। इससे तेल की आपूर्ति के रास्ते में एक नई बाधा पैदा हुई है।
डोनाल्ड ट्रम्प का यह बयान भी सामने आया कि अमेरिका की हुती विद्रोहियों के साथ बातचीत हुई है और वे अमेरिका से कार्रवाई नहीं करने की मांग कर रहे हैं। यदि अमेरिका हुती विद्रोहियों के खिलाफ कार्रवाई से पीछे रहता है, तो तेल की वैश्विक आपूर्ति को लेकर चिंता और बढ़ सकती है।
इस घटनाक्रम ने पश्चिम एशिया में पहले से मौजूद ऊर्जा संकट को और जटिल बना दिया है।
पहले भी प्रभावित हुई थी तेल आपूर्ति
करीब तीन साल पहले जब हुती विद्रोहियों ने इस द्वीप पर कब्जा किया था, तब लाल सागर से तेल की आपूर्ति आधी रह गई थी। स्वेज नहर के रास्ते होने वाला परिवहन भी प्रभावित हुआ था।
उस कब्जे से पहले रोज करीब 93 लाख बैरल तेल वहां से गुजरता था, जो घटकर करीब 46 लाख बैरल रह गया था। इस बार हुती विद्रोहियों की जीत इससे बड़े इलाके में हुई है। ऐसे में यह आशंका जताई जा रही है कि तेल आपूर्ति वाले जहाजों के लिए परेशानी बढ़ सकती है और उनसे अधिक वसूली की जा सकती है।
यदि अमेरिका उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं करता है, तो दुनिया के लिए तेल आपूर्ति का खतरा और बढ़ सकता है।
अमेरिका की भूमिका पर भी उठ रहे सवाल
ट्रम्प के इस बयान पर विश्वास करने वाले लोगों की कमी नहीं है। होर्मुज और तेल कारोबार में अमेरिका की नई दिलचस्पी के बीच यह भी महत्वपूर्ण है कि सऊदी अरब समेत खाड़ी के उसके मित्र देशों को ईरानी हमले की स्थिति में अमेरिका ने अपेक्षाकृत अकेला छोड़ दिया है, जबकि इन देशों के साथ अमेरिका की सुरक्षा संबंधी संधियां हैं।
पिछले नवंबर में ही ट्रम्प और सऊदी सुल्तान मोहम्मद बिन सलमान के बीच रक्षा समझौता हुआ था। इसके बावजूद मौजूदा घटनाक्रम में अमेरिकी रुख पर सवाल उठ रहे हैं।
ट्रम्प की अपनी राजनीतिक और आर्थिक प्राथमिकताएं भी इस नीति को प्रभावित कर सकती हैं। अमेरिका में उनकी राजनीतिक स्थिति को लेकर दबाव के बीच विदेशों में सैन्य हस्तक्षेप के मुद्दे पर अमेरिकी प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण है। दूसरी ओर तेल से होने वाली कमाई को अमेरिकी हितों से जोड़ने की कोशिश भी उनके रुख का हिस्सा बताई जाती है।
हालांकि, अमेरिका की अपनी राजनीतिक और आर्थिक प्राथमिकताएं कुछ भी हों, वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था केवल किसी एक देश की योजना के अनुसार नहीं चल सकती।
ईरान-सऊदी समझौते से बदले समीकरण
नई दिल्ली में ईरान और सऊदी अरब का एक घोषणापत्र पर सहमत होना अमेरिकी नीति के लिए एक अलग तरह का घटनाक्रम है। इसी तरह मक्का संधि के जरिए सऊदी अरब ने अपनी सुरक्षा के लिए वैकल्पिक रास्ता भी बनाया है।
इन घटनाक्रमों से यह संकेत मिलता है कि खाड़ी के देश अपनी सुरक्षा और कूटनीतिक जरूरतों के लिए एक से अधिक विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। लेकिन दूसरी ओर क्षेत्र में जारी सैन्य तनाव तेल आपूर्ति के लिए लगातार जोखिम पैदा कर रहा है।
यदि अमेरिका हुती विद्रोहियों के खिलाफ कार्रवाई से हिचकता है या निष्क्रिय रहता है, तो वैश्विक तेल संकट और गंभीर हो सकता है। कच्चे तेल की कीमत 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुकी है और आगे यह कहां तक जाएगी, इसका अनुमान लगाना मुश्किल है।
होर्मुज संकट का असर पहले भी दिख चुका है
ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमले के बाद शुरू हुई जंग के दौरान होर्मुज से आवाजाही बंद या बेहद सीमित हो गई थी। उस दौरान चीन ने तेल का आयात काफी कम कर दिया था और तेल के जहाज होर्मुज के बजाय लाल सागर के रास्ते आने-जाने लगे थे।
उस समय तेल की कीमतों में बढ़ोतरी हुई थी, लेकिन मौजूदा संकट जैसी तेजी नहीं दिखाई दी थी। इस बार परिस्थितियां इसलिए अधिक गंभीर मानी जा रही हैं क्योंकि केवल कच्चे तेल की आवाजाही ही नहीं, बल्कि रिफाइंड तेल यानी डीजल और पेट्रोल की आपूर्ति भी प्रभावित हो सकती है।
रिफाइंड तेल की आपूर्ति रुकी तो बढ़ेगी मुश्किल
मौजूदा संकट में सबसे बड़ी चिंता रिफाइंड तेल की आवाजाही को लेकर है। यदि डीजल और पेट्रोल की आपूर्ति प्रभावित होती है, तो भारत सहित कई देशों पर इसका असर पड़ सकता है। इसका सीधा प्रभाव आम उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है।
पिछले संकट के दौरान भारत ने रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल आयात किया और उसे रिफाइन करके निर्यात किया। इससे भारत को आर्थिक लाभ मिला और अर्थव्यवस्था को भी समर्थन मिला।
लेकिन इस बार यदि रिफाइंड तेल की आवाजाही रुकती है या प्रभावित होती है, तो भारत समेत कई देशों के सामने अलग तरह की चुनौती पैदा हो सकती है। डीजल और पेट्रोल के उपभोक्ताओं पर भी इसका असर पड़ने की आशंका है।
अमेरिका में भी बढ़ सकता है ईंधन का दबाव
अमेरिका में डीजल की कीमतें जिस रफ्तार से बढ़ी हैं, उससे वहां भी संकट की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है। एक साल के भीतर डीजल की कीमतें दो गुना तक हो गई हैं।
इसके अलावा रूस-यूक्रेन युद्ध भी वैश्विक तेल बाजार के लिए एक अलग चुनौती बना हुआ है। रूस की तेल उत्पादन क्षमता प्रभावित हुई है और उसकी रिफाइनिंग क्षमता को भी नुकसान पहुंचा है। तेल निकालने की मात्रा में भी कमी आई है।
ऐसे में पश्चिम एशिया में बढ़ता संकट और रूस की प्रभावित तेल उत्पादन क्षमता मिलकर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है।
दुनिया के सामने तेल संकट रोकने की चुनौती
ब्रिक्स सम्मेलन में वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा हुई, लेकिन घोषणापत्र में रूस-यूक्रेन युद्ध का उल्लेख नहीं हुआ। इसके बावजूद मौजूदा परिस्थितियों में तेल आपूर्ति का सवाल वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण बना हुआ है।
पश्चिम एशिया में ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच तनाव, होर्मुज की स्थिति, हुती विद्रोहियों की गतिविधियां और रूस की प्रभावित तेल क्षमता—ये सभी कारक मिलकर ऊर्जा बाजार पर दबाव बढ़ा रहे हैं।
यदि ब्रिक्स सहित दुनिया के सभी सक्रिय राष्ट्र समूह मौजूदा संकट को नियंत्रित करने के लिए पहल नहीं करते हैं, तो नया वैश्विक तेल संकट पैदा हो सकता है। ऐसे में कच्चे तेल की कीमत का बढ़ना केवल ऊर्जा बाजार की समस्या नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर परिवहन, उद्योग, महंगाई और व्यापक अर्थव्यवस्था तक पहुंच सकता है।
नई दिल्ली में ईरान और सऊदी अरब के बीच शांति संबंधी सहमति ने कूटनीतिक स्तर पर उम्मीद जरूर जगाई है, लेकिन पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव और तेल आपूर्ति के रास्तों पर मंडराते खतरे ने यह स्पष्ट कर दिया है कि क्षेत्रीय शांति और वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं।

