Top 5 This Week

spot_img

Related Posts

Homeलेख-विचारब्रिक्स शिखर सम्मेलन के बाद...

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के बाद भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को मिली नई मजबूती


नित्य चक्रवर्ती

नई दिल्ली: नई दिल्ली में 13 सितंबर को आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने भारत की विदेश नीति और वैश्विक दक्षिण में उसकी भूमिका को लेकर कई महत्वपूर्ण संकेत दिए हैं। सम्मेलन के दौरान भारत ने चीन और रूस के साथ अपने संबंधों को आगे बढ़ाने के साथ अमेरिका के साथ संबंधों में भी संतुलन बनाए रखने की दिशा में अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को स्पष्ट किया।

चीन के बाद ब्रिक्स में भारत दूसरी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति है। शिखर सम्मेलन में चीन, भारत और रूस के बीच दिखाई दिया सहयोग वैश्विक भू-राजनीति में बदलते समीकरणों की ओर संकेत करता है। बैठक ने यह संदेश भी दिया कि वैश्विक भू-राजनीति की दिशा तय करने का अधिकार केवल अमेरिका तक सीमित नहीं है। ब्रिक्स बहुपक्षवाद में विश्वास करता है और समूह की तीन बड़ी अर्थव्यवस्थाएं भारत, रूस और चीन भी इसी सोच को साझा करती हैं।

वैश्विक दक्षिण में भारत की भूमिका को मिला नया आधार

18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने भारत को वैश्विक दक्षिण में अपनी भूमिका मजबूत करने का अवसर दिया। 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के कुछ समय बाद भारत के इस प्रभाव में कमी आने की बात कही गई थी। करीब बारह साल बाद नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स की विस्तारित बैठक की मेजबानी की और सम्मेलन में अपनी कूटनीतिक प्राथमिकताओं को सामने रखा।

भारत ने आम सहमति के आधार पर संयुक्त घोषणा-पत्र सुनिश्चित किया। इसके साथ ईरान और पश्चिम एशिया में परस्पर विरोधी पक्षों के बीच सुलह कराने में भारत की भूमिका भी सामने आई। सम्मेलन के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का नाम लिए बिना वैश्विक दक्षिण की ओर से उनके एकतरफा शुल्क संबंधी कदमों और व्यापार युद्ध का कड़ा विरोध जताया गया।

मोदी ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ द्विपक्षीय बैठकें भी कीं। इन बैठकों में आर्थिक सहयोग बढ़ाने के साथ भारत की महत्वपूर्ण सीमाओं से जुड़े मुद्दों पर भी जोर दिया गया।

क्या ब्रिक्स के बाद ट्रम्प से दूरी बढ़ा रहा है भारत?

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भारत की सक्रिय भूमिका का यह अर्थ नहीं है कि नरेंद्र मोदी अमेरिका से दूरी बनाने की दिशा में बढ़ रहे हैं। नरेंद्र मोदी आरएसएस से जुड़े रहे हैं और दक्षिणपंथी भाजपा के प्रमुख चेहरे हैं। वहीं डोनाल्ड ट्रम्प स्वयं को वैश्विक दक्षिणपंथी खेमे के नेता के रूप में प्रस्तुत करते हैं। दोनों के राजनीतिक दृष्टिकोण में कई समानताएं भी हैं।

इसके साथ ही नरेंद्र मोदी एक राष्ट्रवादी नेता हैं और दुनिया की सबसे बड़ी आबादी तथा बड़े घरेलू बाजार वाले देश का नेतृत्व करते हैं। ब्रिक्स बैठक के बाद भारत की कूटनीतिक स्थिति में आई मजबूती आने वाले दिनों में अमेरिका के साथ बातचीत के दौरान उसे अधिक मजबूत आधार दे सकती है।

भारत के लिए अमेरिका महत्वपूर्ण साझेदार है, लेकिन रूस और चीन के साथ संबंध भी उसकी विदेश नीति में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। ऐसे में रणनीतिक स्वायत्तता के आधार पर इन संबंधों के बीच संतुलन बनाए रखना भारत के लिए अहम रहेगा।

जी-20 और क्वाड के बीच बदलता अमेरिकी रुख

डोनाल्ड ट्रम्प इस साल दिसंबर में मियामी में जी-20 बैठक की मेजबानी कर रहे हैं। इसी अवधि के आसपास क्वाड का शिखर सम्मेलन भी होने की संभावना है। इसका अर्थ यह होगा कि भारत इसकी मेजबानी नहीं करेगा, जैसा पहले तय किया गया था।

इसके करीब छह सप्ताह बाद 3 नवंबर को अमेरिका में मध्यावधि चुनाव होंगे। यदि मौजूदा संकेत सही साबित होते हैं और रिपब्लिकन पार्टी प्रतिनिधि सभा तथा सीनेट दोनों में हार जाती है, तो ट्रम्प पर घरेलू राजनीतिक दबाव बढ़ सकता है। 2028 में उनका कार्यकाल समाप्त होने तक राष्ट्रपति पद पर तत्काल कोई खतरा नहीं होगा, लेकिन 2028 के राष्ट्रपति चुनाव को ध्यान में रखते हुए उन्हें घरेलू मुद्दों पर अधिक ध्यान देना पड़ सकता है।

ऐसे परिदृश्य में भारत अमेरिका के साथ व्यापार समझौते की अंतिम शर्तों पर बातचीत के दौरान बेहतर स्थिति में हो सकता है। यह समझौता अंतिम रूप दिए जाने के चरण में है।

क्वाड के भविष्य को लेकर भी महत्वपूर्ण संकेत

क्वाड के संदर्भ में भी भारत के लिए बदलती परिस्थितियां महत्वपूर्ण हैं। बीजिंग में पिछले शिखर सम्मेलन के बाद से ट्रम्प ने भारत-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी प्राथमिकता को कम किया है। ऐसे में क्वाड की अगली बैठक का महत्व पहले की तुलना में अलग हो सकता है।

भारत सहयोगी बने रहते हुए अमेरिका के सामने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता पर जोर देने में सहज महसूस कर सकता है। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के बाद भारत के पास 2025 और 2026 की शुरुआत की तुलना में अपने हितों को स्पष्ट तरीके से रखने के लिए बेहतर आधार होने की बात कही जा सकती है।

शी-मोदी बैठक में चीन का आर्थिक संदेश

भारत-चीन संबंधों में सुधार के बीच शी जिनपिंग और नरेंद्र मोदी की द्विपक्षीय बैठक के संदेश पर विशेष ध्यान देना महत्वपूर्ण है। भारतीय प्रधानमंत्री ने बैठक में सीमा से जुड़े कठिन मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। दूसरी ओर, शी जिनपिंग की प्राथमिकता चीन के प्रभाव वाली वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भारत की भागीदारी की संभावना पर अधिक केंद्रित दिखाई दी।

चीनी अधिकारियों ने भारत और चीन दोनों के लिए लाभकारी स्थिति की बात की है, यदि ब्रिक्स की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं इस दिशा में सहयोग करती हैं। इसका अर्थ भारत में अधिक चीनी निवेश और भारत के वैश्विक निर्यात में बढ़ोतरी के रूप में देखा जा रहा है।

हालांकि, भारतीय अधिकारियों को चीनी प्रस्ताव की बारीकी से जांच करनी होगी। उन्हें यह देखना होगा कि इससे भारत को क्या आर्थिक लाभ मिल सकते हैं और चीन से जुड़े संभावित सुरक्षा खतरों का आकलन कैसे किया जाए।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता और आपूर्ति श्रृंखला पर चीन का जोर

शी जिनपिंग की ओर से खुले स्रोत वाली कृत्रिम बुद्धिमत्ता के मंच के लिए कार्ययोजना का प्रस्ताव भी अमेरिका के लिए एक चुनौती के रूप में सामने आया है। भारत के लिए भी इस प्रस्ताव के सभी पहलुओं पर विचार करना महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि भारतीय पक्ष वैश्विक स्तर पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

शी जिनपिंग के वक्तव्यों से यह संकेत मिला कि अगले पांच वर्षों के लिए चीन की भारत संबंधी प्राथमिकता आर्थिक सहयोग पर केंद्रित है। इसमें अधिक व्यापार और निवेश शामिल हैं।

वहीं सीमा और अरुणाचल से जुड़े मतभेद जैसे राजनीतिक मुद्दे मौजूदा स्थिति में बने रह सकते हैं। कुछ चीनी जानकार इसे ‘रणनीतिक गतिरोध’ की स्थिति बताते हैं। चीन यह सुनिश्चित करना चाहेगा कि शांति बनी रहे, ताकि आर्थिक सहयोग में राजनीतिक अड़चनें न आएं।

रूस के साथ संबंधों का विस्तार भी जरूरी

भारत और रूस के संबंध 1991 में सोवियत संघ के टूटने से पहले और उसके बाद भी गहरे भावनात्मक और संरचनात्मक आधार पर बने रहे हैं। नरेंद्र मोदी के कार्यकाल के शुरुआती वर्षों में भारत-रूस संबंधों पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिए जाने को निराशाजनक बताया गया है।

हालांकि, तीसरे कार्यकाल में खाड़ी संकट के कारण भारत को रूस से बड़ी मात्रा में तेल आयात करने के लिए मजबूर होना पड़ा। पिछले दो वर्षों में रूस ने भारत को भुगतान संतुलन के संकट से निपटने में मदद की है।

अब भारत सरकार के सामने रक्षा सौदों और पेट्रोलियम आयात बढ़ाने के अलावा रूस के साथ सहयोग के अन्य क्षेत्रों का विस्तार करने की आवश्यकता भी है। इससे दोनों देशों के बीच संबंधों का आधार व्यापक किया जा सकता है।

भारत के सामने रणनीतिक स्वायत्तता का अवसर

कुल मिलाकर, नई दिल्ली में हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से भारत के लिए यह संदेश सामने आया है कि अमेरिका और चीन, दोनों के साथ संबंधों को संभालते समय रणनीतिक स्वायत्तता पर अधिक मजबूती से जोर देना होगा।

रूस के साथ भारत के पुराने और संरचनात्मक संबंध हैं। अमेरिका के साथ व्यापार और रणनीतिक सहयोग महत्वपूर्ण है, जबकि चीन के साथ आर्थिक संबंधों के साथ सीमा से जुड़े कठिन मुद्दे भी मौजूद हैं। ऐसे में तीनों बड़ी शक्तियों के साथ रचनात्मक संबंध बनाए रखना भारत की विदेश नीति के लिए महत्वपूर्ण चुनौती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने भारतीय विदेश नीति को अधिक स्वतंत्र आधार पर आगे बढ़ाने का अवसर है। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भारत को जो कूटनीतिक और रणनीतिक लाभ मिले हैं, उनका इस्तेमाल किस तरह किया जाता है, इस पर अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों की नजर रहेगी।

खास तौर पर इसलिए भी कि अगली अवधि में चीन भारत से ब्रिक्स की अध्यक्षता संभालेगा और 2027 में शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा। ऐसे में आने वाले समय में भारत-चीन संबंध, भारत-अमेरिका संवाद और भारत-रूस सहयोग के बीच संतुलन भारतीय विदेश नीति की दिशा के लिए महत्वपूर्ण रहेगा।

Popular Articles