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नोटबंदी के दस साल बाद यूपीआई शुल्क पर सवाल, कैशलेस अर्थव्यवस्था के दावे की फिर चर्चा

सचिन कुमार गौतम

नई दिल्ली: नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा 2016 में लिया गया नोटबंदी का फैसला करीब दस साल बाद भी भारतीय राजनीति और अर्थव्यवस्था में बहस का विषय बना हुआ है। उस समय सरकार ने कहा था कि नोटबंदी से आतंकवाद की कमर टूटेगी, काले धन पर प्रभावी कार्रवाई होगी और देश तेजी से नकदी रहित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ेगा। हालांकि, एक दशक बाद इन दावों के परिणामों को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

आलोचकों का कहना है कि नोटबंदी से न तो काला धन पूरी तरह खत्म हुआ, न आतंकवाद पर निर्णायक अंकुश लगा और न ही देश नकदी से पूरी तरह मुक्त हो पाया। इसी बहस के बीच यूपीआई लेन-देन पर प्रस्तावित शुल्क ने डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने की तत्कालीन नीति पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

नोटबंदी के बाद डिजिटल भुगतान को मिला बढ़ावा

नोटबंदी के बाद सरकार ने नकदी के विकल्प के तौर पर डिजिटल भुगतान को बड़े पैमाने पर प्रोत्साहित किया। लोगों से अपील की गई कि वे नकदी के बजाय डिजिटल माध्यमों, विशेष रूप से यूपीआई, का इस्तेमाल करें।

शुरुआत में डिजिटल भुगतान सुविधाजनक और आधुनिक विकल्प के रूप में तेजी से सामने आया। छोटे दुकानदारों से लेकर बड़े कारोबारियों तक यूपीआई का इस्तेमाल बढ़ा। इससे डिजिटल लेन-देन आम लोगों की रोजमर्रा की आर्थिक गतिविधियों का हिस्सा बन गया।

लेकिन अब 2,000 रुपये से अधिक के व्यक्ति-से-व्यापारी यूपीआई लेन-देन पर प्रस्तावित शुल्क की चर्चा ने सरकार की उस नीति को लेकर सवाल पैदा कर दिए हैं, जिसके तहत देश को नकदी रहित अर्थव्यवस्था की ओर ले जाने पर जोर दिया गया था।

2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई भुगतान पर प्रस्तावित शुल्क

सरकार ने घोषणा की है कि 2,000 रुपये से अधिक के व्यक्ति-से-व्यापारी यूपीआई लेन-देन पर 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर लगाया जाएगा। उदाहरण के तौर पर यदि कोई ग्राहक किसी व्यापारी को यूपीआई के जरिए 5,000 रुपये का भुगतान करता है, तो उस लेन-देन पर 20 रुपये का शुल्क बनता है।

हालांकि, शुल्क की दरों और नियमों को लेकर अलग-अलग चर्चाएं सामने आई हैं। इसलिए इसका अंतिम प्रभाव वास्तविक दिशानिर्देशों के आधार पर ही स्पष्ट होगा। सरकार का तर्क है कि यह शुल्क ग्राहक से सीधे नहीं लिया जाएगा, बल्कि व्यापारी या भुगतान सेवा प्रदाता के स्तर पर इसका निपटारा होगा।

फिर भी आम उपभोक्ताओं की चिंता यह है कि व्यापारी इस अतिरिक्त लागत को किसी न किसी रूप में ग्राहकों पर डाल सकते हैं।

छोटे व्यापारियों पर पड़ सकता है असर

व्यापारी अतिरिक्त लागत की भरपाई के लिए वस्तुओं की कीमत बढ़ा सकते हैं, अलग से सेवा शुल्क ले सकते हैं या डिजिटल भुगतान स्वीकार करने से बच सकते हैं। ऐसी स्थिति में यूपीआई को बढ़ावा देने के बजाय शुल्क का प्रस्ताव डिजिटल भुगतान को हतोत्साहित कर सकता है।

कांग्रेस ने इसी आधार पर इसे ‘द ग्रेट यूपीआई लूट’ करार दिया है। पार्टी का सवाल है कि जब नोटबंदी के समय सरकार ने डिजिटल भुगतान को समाधान के रूप में प्रस्तुत किया था, तो अब उसी व्यवस्था पर शुल्क लगाने की जरूरत क्यों महसूस हुई।

एमडीआर वह शुल्क है, जो डिजिटल भुगतान की प्रक्रिया पूरी करने के लिए व्यापारी को बैंक, कार्ड नेटवर्क या भुगतान सेवा प्रदाता को देना पड़ता है। यूपीआई के मामले में लंबे समय से शून्य एमडीआर की नीति लागू रही है। इसका उद्देश्य छोटे दुकानदारों और आम उपभोक्ताओं के बीच डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा देना था।

यदि इस व्यवस्था में शुल्क जोड़ा जाता है तो छोटे व्यापारियों पर इसका प्रभाव महत्वपूर्ण हो सकता है। किराना दुकानों, रेहड़ी-पटरी वालों और छोटे सेवा प्रदाताओं के लिए प्रत्येक लेन-देन पर लगने वाला शुल्क उनकी कमाई को प्रभावित कर सकता है।

संसद में चर्चा को लेकर भी सवाल

यूपीआई शुल्क से जुड़ा एक सवाल यह भी है कि इतने महत्वपूर्ण फैसले पर संसद में पर्याप्त चर्चा क्यों नहीं हुई। बजट सत्र वित्तीय नीतियों पर विस्तार से विचार-विमर्श का अवसर देता है।

विपक्षी दलों का कहना है कि यूपीआई शुल्क जैसे फैसले पर संसद के साथ व्यापारिक संगठनों, बैंकों और उपभोक्ता समूहों से भी सुझाव लिए जाने चाहिए थे। उनके अनुसार व्यापक विमर्श के बिना लिए गए फैसले से पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर सवाल उठ सकते हैं।

यूपीआई बाजार में बड़ी कंपनियों की हिस्सेदारी

यूपीआई के क्षेत्र में फोनपे, गूगल पे और पेटीएम जैसी कंपनियों की बड़ी भूमिका है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार यूपीआई बाजार में फोनपे की हिस्सेदारी लगभग 48.9 प्रतिशत, गूगल पे की 37.7 प्रतिशत और पेटीएम की करीब 8.3 प्रतिशत बताई जाती है। शेष हिस्सेदारी अन्य कंपनियों के पास है।

फोनपे में अमेरिकी कंपनी वॉलमार्ट की बड़ी हिस्सेदारी है, जबकि गूगल पे भी अमेरिकी कंपनी का डिजिटल भुगतान मंच है। इसी आधार पर आलोचक आरोप लगा रहे हैं कि एमडीआर लागू होने से बड़ी भुगतान कंपनियों की आमदनी बढ़ सकती है और इसका बोझ अंततः भारतीय उपभोक्ताओं तथा छोटे व्यापारियों तक पहुंच सकता है।

नोटबंदी के बाद भुगतान कंपनियों को मिला था लाभ

नोटबंदी के तुरंत बाद डिजिटल भुगतान कंपनियों को बड़ा लाभ मिला था। उस दौर में पेटीएम के लेन-देन में भारी वृद्धि दर्ज की गई थी।

8 नवंबर को नोटबंदी की घोषणा के बाद 10 नवंबर को पेटीएम ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर के साथ अखबारों में पूरे पन्ने का विज्ञापन प्रकाशित कर उन्हें इस फैसले के लिए बधाई दी थी। इस विज्ञापन को लेकर राजनीतिक विवाद भी हुआ।

अरविंद केजरीवाल ने इसकी आलोचना की थी, जबकि राहुल गांधी ने राजनीतिक व्यंग्य करते हुए पेटीएम को ‘पेमेंट टू मोदी’ कहा था। उस समय उनके बयान की आलोचना हुई। हालांकि, बाद की घटनाओं ने इस बहस को जरूर तेज किया कि सरकारी नीतियों से किन निजी कंपनियों को सबसे अधिक लाभ मिला।

नोटबंदी के समय चिप वाली अफवाह भी चर्चा में रही

नोटबंदी के दौरान नए नोटों में चिप होने जैसी अफवाहें भी व्यापक रूप से फैली थीं। सरकार और उसके समर्थकों ने डिजिटल अर्थव्यवस्था को भविष्य का रास्ता बताया था।

अब, जब यूपीआई पर शुल्क लगाने की चर्चा हो रही है, तो वही बुनियादी सवाल फिर सामने है कि डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देना केवल उस समय की जरूरत थी या सरकार इसे आम जनता के लिए स्थायी, सुविधाजनक और सस्ता विकल्प बनाए रखना चाहती है।

दस साल बाद नोटबंदी के दावों का मूल्यांकन

नोटबंदी के करीब दस साल बाद यह बहस जारी है कि उस फैसले से जुड़े मूल उद्देश्यों को किस हद तक हासिल किया जा सका। आलोचकों के अनुसार काला धन, आतंकवाद और नकदी रहित अर्थव्यवस्था से जुड़े दावों के परिणाम अपेक्षित नहीं रहे।

इसी संदर्भ में यूपीआई शुल्क का प्रस्ताव एक नई बहस को जन्म देता है। यदि डिजिटल भुगतान को व्यापक स्तर पर अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया था, तो उस व्यवस्था में अतिरिक्त लागत जोड़ने का असर आम लोगों और छोटे व्यापारियों पर नहीं पड़ना चाहिए।

यदि यूपीआई पर शुल्क लागू होता है तो सरकार के सामने यह सुनिश्चित करने की चुनौती होगी कि इसका भार उपभोक्ताओं और छोटे व्यापारियों पर न पड़े। अन्यथा नकदी रहित अर्थव्यवस्था का लक्ष्य आम जनता के लिए सुविधा के बजाय अतिरिक्त आर्थिक बोझ का कारण बन सकता है।

नोटबंदी और उसके बाद डिजिटल भुगतान को लेकर बनी नीतियों का मूल्यांकन अंततः नारों और दावों के आधार पर नहीं, बल्कि उनके वास्तविक आर्थिक परिणामों के आधार पर ही किया जाना होगा।

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