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भारतीय भूभाग पर फैसले का अधिकार किसी तीसरे देश को नहीं, पाकिस्तान-चीन सीमा आयोग पर भारत की आपत्ति

नई दिल्ली, 18 सितंबर। पाकिस्तान और चीन के बीच सीमा संबंधी सहयोग को लेकर भारत ने एक बार फिर जम्मू-कश्मीर और लद्दाख पर अपना स्पष्ट रुख सामने रखा है। इस्लामाबाद में पाकिस्तान-चीन सीमा संयुक्त आयोग की पहली बैठक शुरू होने के बाद भारत ने इसे खारिज करते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत के अभिन्न और अविभाज्य हिस्से हैं।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारतीय क्षेत्रों से संबंधित पाकिस्तान और चीन के बीच किसी भी प्रकार का सीमा सहयोग भारत के लिए पूरी तरह अस्वीकार्य है। भारत ने पाकिस्तान से भारतीय क्षेत्र पर अपने अवैध कब्जे को समाप्त करने की मांग भी दोहराई है।

पाकिस्तान-चीन सीमा आयोग हुआ सक्रिय

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के अनुसार, 16 सितंबर 2026 को दोनों देशों ने सीमा संयुक्त आयोग को औपचारिक रूप से सक्रिय किया। पाकिस्तान ने इसे सीमा प्रबंधन, संयुक्त सीमा सर्वेक्षण, व्यापारिक आवाजाही और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है।

पाकिस्तान इस तंत्र को चीन के साथ द्विपक्षीय सहयोग बढ़ाने के साधन के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। सीमा से जुड़े मामलों के साथ व्यापार और लोगों के बीच संपर्क को भी इस सहयोग के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में देखा जा रहा है।

भारत की आपत्ति का मूल कारण यह है कि पाकिस्तान और चीन के बीच प्रस्तावित सीमा सहयोग का संबंध उन क्षेत्रों से भी जुड़ता है, जिन्हें भारत अपना संप्रभु भूभाग मानता है। भारत का कहना है कि ऐसे किसी क्षेत्र के संबंध में दो अन्य देश आपस में कोई व्यवस्था नहीं कर सकते, जो भारत की संप्रभुता से संबंधित है।

इसी आधार पर नई दिल्ली ने पाकिस्तान-चीन सीमा आयोग को कानूनी आधार से रहित बताया है। भारत का स्पष्ट रुख है कि भारतीय भूभाग से जुड़े मामलों में किसी तीसरे देश को निर्णय लेने या व्यवस्था करने का अधिकार नहीं है।

1963 के समझौते को भारत ने कभी स्वीकार नहीं किया

भारत की आपत्ति का एक महत्वपूर्ण आधार 2 मार्च 1963 को हुआ तथाकथित चीन-पाकिस्तान सीमा समझौता भी है। भारत सरकार लंबे समय से इसे अवैध और अमान्य मानती रही है।

भारत के अनुसार, इस समझौते के तहत पाकिस्तान ने भारतीय क्षेत्र की शक्सगाम घाटी से संबंधित लगभग 5,180 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र चीन को सौंपने की व्यवस्था की थी। भारत ने स्पष्ट किया है कि उसने इस समझौते को कभी मान्यता नहीं दी।

भारत का आधिकारिक रुख यह भी है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के पूरे केंद्रशासित प्रदेश भारत के अभिन्न और अविभाज्य हिस्से हैं। विदेश मंत्रालय पहले भी कहता रहा है कि पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्रों तथा चीन से जुड़े ऐसे किसी भी कदम को भारत अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता से जोड़कर देखता है।

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख पर भारत का स्पष्ट रुख

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को लेकर भारत की स्थिति स्पष्ट है। भारत इन्हें अपने संवैधानिक तथा संप्रभु क्षेत्र का हिस्सा मानता है। इसी आधार पर भारत ने पाकिस्तान और चीन के बीच भारतीय क्षेत्रों से संबंधित किसी भी सीमा सहयोग को अस्वीकार्य बताया है।

यही वह बिंदु है जहां कश्मीर को लेकर भारत और पाकिस्तान की मूल स्थिति अलग दिखाई देती है। भारत जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को अपने संवैधानिक तथा संप्रभु क्षेत्र का हिस्सा मानता है, जबकि पाकिस्तान अपने आधिकारिक बयानों में जम्मू-कश्मीर को विवादित मुद्दा बताता रहा है।

मई 2026 में चीन और पाकिस्तान के संयुक्त बयान में भी पाकिस्तान ने चीन को जम्मू-कश्मीर की स्थिति से अवगत कराया था। चीन ने इसे ऐतिहासिक रूप से लंबित विवाद बताते हुए संयुक्त राष्ट्र चार्टर तथा संबंधित प्रस्तावों के अनुरूप शांतिपूर्ण समाधान की बात कही थी।

कश्मीर नीति में दावे और व्यवहार

कश्मीर के मुद्दे पर पाकिस्तान की नीति को समझने के लिए उसके बयानों और गतिविधियों को अलग-अलग देखना जरूरी है। पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जम्मू-कश्मीर को विवादित मुद्दे के रूप में प्रस्तुत करता है और इसके समाधान की मांग करता है।

दूसरी ओर, वह चीन के साथ ऐसे सीमा और संपर्क संबंधी ढांचे को आगे बढ़ा रहा है, जिनका संबंध भारत द्वारा अपने क्षेत्र के रूप में दावा किए जाने वाले इलाकों से भी जुड़ता है। यही स्थिति भारत की ओर से गंभीर आपत्ति का कारण बनती है।

पाकिस्तान की ओर से चीन के साथ सीमा आयोग को सीमा प्रबंधन और व्यापारिक संपर्क बढ़ाने के लिए उपयोगी बताया गया है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने इसे दोनों देशों के बीच सहयोग का नया चरण बताया है।

भारत इसे अलग नजरिये से देखता है और मानता है कि भारतीय भूभाग से जुड़े किसी भी मामले में पाकिस्तान को चीन के साथ निर्णय लेने का अधिकार नहीं है।

गिलगित-बाल्टिस्तान का महत्व

गिलगित-बाल्टिस्तान का महत्व भी इसी संदर्भ में सामने आता है। यह क्षेत्र भौगोलिक रूप से भारत, पाकिस्तान, चीन और अफगानिस्तान के निकट स्थित है तथा चीन-पाकिस्तान आर्थिक संपर्क के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है।

भारत के लिए इसका महत्व केवल क्षेत्रीय दावे तक सीमित नहीं है, बल्कि उत्तरी सीमाओं की सुरक्षा और मध्य एशिया से जुड़े व्यापक भू-राजनीतिक समीकरणों से भी जुड़ा है।

भारत का कहना है कि पाकिस्तान को भारतीय क्षेत्र पर अपने कब्जे को समाप्त करना चाहिए और ऐसे कदमों से बचना चाहिए, जिनसे उस कब्जे को किसी अन्य देश के साथ सहयोग के माध्यम से वैधता मिलने का आभास पैदा हो।

भारत ने पहले भी चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे से संबंधित उन गतिविधियों पर आपत्ति जताई है, जो उसके अनुसार भारतीय संप्रभु क्षेत्र से गुजरती हैं।

पाकिस्तान-चीन सहयोग पर भारत की आपत्ति

कश्मीर पर पाकिस्तान की नीति में इसलिए एक विरोधाभास दिखाई देता है। एक ओर वह जम्मू-कश्मीर के भविष्य को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विवाद और समाधान की बात करता है, दूसरी ओर पाकिस्तान-चीन सहयोग के ऐसे ढांचे को आगे बढ़ाता है, जिनमें भारत द्वारा दावा किए गए क्षेत्रों से संबंधित गतिविधियां शामिल हैं।

भारत इसी आधार पर पाकिस्तान के रुख पर सवाल उठाता है और कहता है कि किसी तीसरे देश के साथ समझौते करके भारतीय भूभाग की स्थिति नहीं बदली जा सकती।

भारत का ताजा संदेश इसी लंबे समय से चले आ रहे रुख की पुनर्पुष्टि है। नई दिल्ली ने स्पष्ट किया है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को लेकर उसकी संप्रभुता की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है और भारतीय क्षेत्रों से संबंधित पाकिस्तान-चीन सीमा सहयोग स्वीकार नहीं किया जाएगा।

कश्मीर का क्षेत्रीय और कूटनीतिक आयाम

पूरे घटनाक्रम से यह स्पष्ट होता है कि कश्मीर का प्रश्न केवल भारत और पाकिस्तान के बीच राजनीतिक मतभेद तक सीमित नहीं है, बल्कि चीन की भूमिका के कारण इसका रणनीतिक और क्षेत्रीय आयाम भी महत्वपूर्ण बना हुआ है।

पाकिस्तान-चीन सीमा आयोग की शुरुआत ने कश्मीर से जुड़े पुराने विवाद को एक बार फिर कूटनीतिक चर्चा के केंद्र में ला दिया है। भारत ने अपने रुख को स्पष्ट करते हुए कहा है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के संबंध में उसकी संप्रभुता पर किसी बाहरी व्यवस्था का कोई प्रभाव नहीं पड़ सकता।

वहीं, पाकिस्तान और चीन अपने सहयोग को सीमा प्रबंधन और क्षेत्रीय संपर्क के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम में भारत ने यह स्पष्ट किया है कि भारतीय भूभाग से जुड़े किसी भी मामले में किसी तीसरे देश को निर्णय लेने का अधिकार नहीं है।

पाकिस्तान-चीन सीमा संयुक्त आयोग के सक्रिय होने के बाद जम्मू-कश्मीर और लद्दाख से जुड़ा यह मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। भारत का कहना है कि उसकी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता से जुड़े मामलों पर किसी बाहरी व्यवस्था का कोई प्रभाव नहीं पड़ सकता।

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