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नई शिक्षा नीति 2020 के तहत त्रिभाषा व्यवस्था लागू करने की दिशा में बढ़े कदम, छात्रों को मिलेगी भाषा चयन की स्वतंत्रता

नई दिल्ली, 18 सितंबर। नई शिक्षा नीति 2020 के तहत विद्यालयों में त्रिभाषा व्यवस्था को प्रभावी ढंग से लागू करने की दिशा में केंद्र सरकार और केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की ओर से किए जा रहे प्रयास भारतीय शिक्षा व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत दे रहे हैं। भारत जैसे भाषाई और सांस्कृतिक विविधता वाले देश में विद्यार्थियों को एक भाषा तक सीमित रखने के बजाय तीन भाषाओं का ज्ञान देने की व्यवस्था उनके शैक्षणिक विकास के साथ-साथ देश की विविधता को समझने का अवसर भी प्रदान कर सकती है।

त्रिभाषा नीति का मूल उद्देश्य किसी भाषा को विद्यार्थियों पर थोपना नहीं, बल्कि उन्हें अपनी मातृभाषा, भारतीय भाषाओं और अन्य उपयोगी भाषाओं से परिचित कराना है। नई शिक्षा नीति 2020 में भाषाई विविधता को ध्यान में रखते हुए विद्यार्थियों को तीन भाषाएं सीखने की व्यवस्था की गई है।

तीन भाषाओं के अध्ययन की व्यवस्था

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत विद्यार्थियों को तीन भाषाएं सीखने की व्यवस्था की गई है, जिनमें कम से कम दो भारतीय भाषाएं होना आवश्यक है। यह व्यवस्था सरकारी और निजी, दोनों विद्यालयों में लागू किए जाने की परिकल्पना करती है। विद्यार्थियों और राज्यों को अपनी आवश्यकता तथा सुविधा के अनुसार भाषाओं का चयन करने की स्वतंत्रता दी गई है।

नीति में स्पष्ट किया गया है कि किसी भी राज्य या विद्यार्थी पर कोई भाषा थोपी नहीं जाएगी। भाषा चयन से जुड़ा यह प्रावधान त्रिभाषा व्यवस्था को व्यावहारिक स्वरूप देने के साथ-साथ विद्यार्थियों और राज्यों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखने का प्रयास करता है।

कक्षा नौवीं से भाषाओं के अध्ययन पर विशेष जोर देने का उद्देश्य विद्यार्थियों को पर्याप्त समय उपलब्ध कराना है, ताकि वे चुनी गई भाषाओं को केवल एक विषय के रूप में न पढ़ें, बल्कि उनका व्यावहारिक ज्ञान भी विकसित कर सकें। भाषा केवल परीक्षा में अंक प्राप्त करने का माध्यम नहीं है। इसके माध्यम से विद्यार्थी किसी समाज की संस्कृति, साहित्य, इतिहास और जीवन पद्धति को समझ सकता है।

तीन भाषाओं का ज्ञान विद्यार्थियों के सामने उच्च शिक्षा, रोजगार और संचार के नए अवसर भी खोल सकता है। बदलते समय में एक से अधिक भाषाओं की जानकारी विद्यार्थियों की संवाद क्षमता को व्यापक बनाने में उपयोगी हो सकती है।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश से मिली व्यावहारिक राहत

त्रिभाषा व्यवस्था को लागू करने में सबसे बड़ी चुनौतियों में पर्याप्त संख्या में योग्य भाषा शिक्षकों की उपलब्धता भी शामिल है। देश के अनेक विद्यालयों में भारतीय भाषाओं के सभी विषयों के लिए अलग-अलग प्रशिक्षित शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में अचानक नई व्यवस्था लागू करने से विद्यालयों और विद्यार्थियों के सामने व्यावहारिक कठिनाइयां पैदा हो सकती थीं।

इसी स्थिति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट के निर्देश से विद्यार्थियों को मिली राहत महत्वपूर्ण है। शिक्षा नीति के उद्देश्यों और विद्यालयों में उपलब्ध वास्तविक संसाधनों के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। नीति तैयार करना जितना महत्वपूर्ण है, उसका सुचारु क्रियान्वयन भी उतना ही जरूरी है।

यदि विद्यालयों के पास आवश्यक शिक्षक और पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध नहीं हों तो विद्यार्थियों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में न्यायालय के निर्देश से तत्काल परिस्थितियों में राहत का रास्ता तैयार हुआ है।

आर-3 पाठ्यपुस्तकों को लेकर सीबीएसई की अंतरिम व्यवस्था

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की ओर से कहा गया है कि जब तक विशेष आर-3 पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध नहीं हो जातीं, तब तक कक्षा नौवीं के विद्यार्थी चुनी गई भाषा के लिए कक्षा छह की आर-3 पाठ्यपुस्तकों के 2026-27 संस्करण का उपयोग कर सकेंगे।

इस अंतरिम व्यवस्था से विद्यालयों को आवश्यक शैक्षणिक व्यवस्था तैयार करने के लिए समय मिलेगा और विद्यार्थियों की पढ़ाई में व्यवधान की स्थिति से बचने में मदद मिल सकती है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि नई व्यवस्था को लागू करने के दौरान उपलब्ध संसाधनों और विद्यालयों की वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखा जा रहा है।

बोर्ड ने यह भी स्पष्ट किया है कि जिन विद्यालयों में पर्याप्त संख्या में योग्य भारतीय भाषा शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं, वहां अंतरिम व्यवस्था के तहत अन्य विषयों के ऐसे शिक्षकों की सेवाएं ली जा सकती हैं, जिन्हें संबंधित भाषा का कार्यात्मक ज्ञान हो।

हालांकि, यह व्यवस्था स्थायी विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि संक्रमण काल में विद्यार्थियों की पढ़ाई जारी रखने के उद्देश्य से की गई है। इससे विद्यालयों को स्थायी रूप से आवश्यक भाषा शिक्षकों की व्यवस्था करने के लिए समय मिल सकता है।

शिक्षक और प्रशिक्षण पर देना होगा ध्यान

त्रिभाषा व्यवस्था के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए केवल नीति और पाठ्यपुस्तकों की उपलब्धता पर्याप्त नहीं होगी। इसके लिए योग्य शिक्षक, प्रशिक्षण और विद्यालयों में आवश्यक संसाधनों की भी जरूरत होगी।

इस पूरी प्रक्रिया से यह बात सामने आती है कि शिक्षा सुधार केवल कागज पर बनाई गई नीति से सफल नहीं होते। किसी भी नई व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए उसके अनुरूप मानव संसाधन, शिक्षण सामग्री और प्रशिक्षण की व्यवस्था भी जरूरी है।

इसलिए अगले चरण में भाषा शिक्षकों की पर्याप्त नियुक्ति और प्रशिक्षण पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। विद्यालयों में पर्याप्त संसाधन उपलब्ध होने से विद्यार्थियों के लिए नई भाषाओं का अध्ययन अधिक सहज और प्रभावी बनाया जा सकेगा।

त्रिभाषा सूत्र का पुराना इतिहास

भारत में त्रिभाषा व्यवस्था की अवधारणा नई नहीं है। तीन-भाषा सूत्र का प्रस्ताव शिक्षा आयोग 1964-66 यानी कोठारी आयोग ने किया था। इसके बाद राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968 में इसे औपचारिक रूप से अपनाया गया।

वर्ष 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी इसकी पुष्टि की गई और 1992 में किए गए संशोधन के माध्यम से भाषाई विविधता तथा राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया। इस प्रकार त्रिभाषा सूत्र भारतीय शिक्षा व्यवस्था में लंबे समय से चली आ रही अवधारणा है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने बहुभाषावाद को बढ़ावा देने के उद्देश्य से इस अवधारणा को नए स्वरूप में आगे बढ़ाया है। इसका मूल विचार यह है कि विद्यार्थी अपनी मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा से जुड़े रहें और साथ ही अन्य भारतीय भाषाओं का ज्ञान प्राप्त करें।

इससे देश के अलग-अलग हिस्सों के बीच संवाद और सांस्कृतिक समझ को मजबूती मिल सकती है। भारत की भाषाई विविधता को देखते हुए बहुभाषी शिक्षा विद्यार्थियों को विभिन्न भाषाई और सांस्कृतिक परिवेशों को समझने का अवसर प्रदान कर सकती है।

उच्च शिक्षा और रोजगार में भी उपयोगी हो सकती है भाषाई दक्षता

आज उच्च शिक्षा और रोजगार का क्षेत्र तेजी से बहुआयामी हो रहा है। एक से अधिक भाषाओं का ज्ञान विद्यार्थियों को देश के विभिन्न क्षेत्रों में संवाद करने में सहायता दे सकता है। भारतीय भाषाओं के साथ किसी अन्य भाषा का अध्ययन उन्हें व्यापक ज्ञान और संचार क्षमता प्रदान कर सकता है।

डिजिटल युग में भाषाई दक्षता का महत्व भी बढ़ गया है। अलग-अलग भाषाओं की समझ विद्यार्थियों को विभिन्न क्षेत्रों और लोगों के साथ संवाद स्थापित करने में सहायता कर सकती है।

हालांकि, त्रिभाषा नीति का वास्तविक लाभ तभी मिल सकेगा, जब इसे विद्यार्थियों पर अतिरिक्त बोझ बनाए बिना रुचिकर तरीके से लागू किया जाए। भाषा सीखने के लिए केवल पाठ्यपुस्तक पर्याप्त नहीं होती। बातचीत, साहित्य, कहानी, कविता, सांस्कृतिक गतिविधियां और तकनीकी माध्यम भाषा सीखने को प्रभावी बनाने में उपयोगी साधन बन सकते हैं।

विद्यालयों को ऐसा वातावरण तैयार करना होगा, जिसमें विद्यार्थी नई भाषा को कठिन विषय समझने के बजाय सीखने और समझने के अवसर के रूप में देखें।

व्यापक क्रियान्वयन के लिए तैयारियों पर जोर

अगले वर्ष से त्रिभाषा नीति को व्यापक रूप से लागू करने की दिशा में बढ़ते कदम भारतीय शिक्षा व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण अवसर हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश से तत्काल व्यावहारिक कठिनाइयों को दूर करने में मदद मिली है और विद्यार्थियों की पढ़ाई को निरंतरता मिल सकती है।

अब आवश्यकता इस बात की है कि केंद्र, राज्य, बोर्ड और विद्यालय मिलकर पर्याप्त भाषा शिक्षक उपलब्ध कराएं। इसके साथ ही पाठ्यपुस्तकों और प्रशिक्षण की व्यवस्था भी समय पर पूरी करनी होगी।

तीन भाषाएं सीखना विद्यार्थियों के लिए केवल शिक्षा नीति की औपचारिकता नहीं, बल्कि भविष्य की उपयोगी क्षमता बन सकता है। यदि त्रिभाषा व्यवस्था को भाषाई सम्मान, विद्यार्थी की स्वतंत्र पसंद और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के साथ लागू किया गया, तो यह भारत की भाषाई विविधता को समझने और उसे एक शैक्षणिक ताकत में बदलने का माध्यम बन सकती है।

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