नई दिल्ली, 28 जून। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की मंत्रिपरिषद में जल्द फेरबदल और विस्तार होने की संभावना जताई जा रही है। राजनीतिक और सरकारी सूत्रों के अनुसार, सत्तारूढ़ दल संगठन और सरकार दोनों स्तरों पर व्यापक बदलाव की तैयारी में है। यदि सब कुछ तय कार्यक्रम के अनुसार रहा तो यह प्रक्रिया संसद के मानसून सत्र से पहले पूरी की जा सकती है।
सूत्रों का कहना है कि मंत्रिपरिषद में प्रस्तावित फेरबदल को भारतीय जनता पार्टी के संगठनात्मक पुनर्गठन के साथ जोड़ा जा सकता है। माना जा रहा है कि पार्टी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के नेतृत्व में नई संगठनात्मक टीम की घोषणा और मंत्रिपरिषद में बदलाव लगभग एक साथ किए जा सकते हैं।
संगठन और सरकार में संतुलन की तैयारी
सूत्रों के अनुसार, पार्टी नेतृत्व ने संगठन के नए पदाधिकारियों के नामों पर लगभग सहमति बना ली है। नई टीम में अपेक्षाकृत युवा चेहरों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दिए जाने की संभावना जताई जा रही है।
इसके साथ ही कुछ केंद्रीय मंत्रियों को संगठन में अहम जिम्मेदारी देकर सरकार से बाहर लाया जा सकता है, जबकि संगठन में सक्रिय कुछ नेताओं को मंत्रिपरिषद में शामिल किए जाने पर भी विचार चल रहा है। इस कदम का उद्देश्य संगठन और सरकार के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना माना जा रहा है।
कुछ मंत्रालयों में बदलाव की चर्चा
राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि कुछ मंत्रियों के विभागों में परिवर्तन किया जा सकता है। विशेष रूप से शिक्षा मंत्रालय को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। पिछले समय में राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा से जुड़े विवादों और केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की मूल्यांकन व्यवस्था को लेकर उठे सवालों के बाद शिक्षा मंत्रालय के नेतृत्व को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हुई हैं।
हालांकि सरकार या पार्टी की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक संकेत नहीं दिया गया है।
जुलाई में हो सकता है फैसला
सूत्रों का कहना है कि यदि मंत्रिपरिषद में फेरबदल होता है तो इसकी घोषणा जुलाई के दौरान किसी भी समय की जा सकती है। संसद का मानसून सत्र सामान्यतः जुलाई के तीसरे सप्ताह में शुरू होता है और उससे पहले सरकार अपनी नई टीम के साथ सत्र में प्रवेश करना चाहती है।
हालांकि अंतिम निर्णय प्रधानमंत्री के कार्यक्रम और राजनीतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर लिया जाएगा।
क्षेत्रीय और सामाजिक संतुलन पर रहेगा जोर
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संभावित फेरबदल में क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व, सामाजिक संतुलन, जातीय समीकरण और आगामी विधानसभा चुनावों को विशेष महत्व दिया जा सकता है।
अगले वर्ष उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। ऐसे में इन राज्यों को मंत्रिपरिषद में अधिक प्रतिनिधित्व मिलने की संभावना व्यक्त की जा रही है। इसके अलावा पश्चिम बंगाल में संगठन को और मजबूत करने की रणनीति के तहत वहां से भी कुछ सांसदों को मंत्रिपरिषद में स्थान मिलने की चर्चा है।
‘एक व्यक्ति, एक पद’ के सिद्धांत पर नजर
सूत्रों के अनुसार, भारतीय जनता पार्टी अपने ‘एक व्यक्ति, एक पद’ के सिद्धांत को लागू करने की दिशा में आगे बढ़ सकती है।
इसी क्रम में उत्तर प्रदेश और दिल्ली संगठन की जिम्मेदारी संभाल रहे केंद्रीय मंत्री पंकज चौधरी और हर्ष मल्होत्रा के भविष्य को लेकर भी अटकलें लगाई जा रही हैं। यदि पार्टी इस सिद्धांत का पालन करती है तो उन्हें सरकार या संगठन में से किसी एक जिम्मेदारी का चयन करना पड़ सकता है।
हालांकि इस विषय पर अभी तक कोई आधिकारिक निर्णय सामने नहीं आया है।
राज्यसभा और चुनावी रणनीति का भी असर
हाल में संपन्न राज्यसभा चुनावों में कुछ केंद्रीय मंत्रियों को दोबारा उम्मीदवार नहीं बनाए जाने के बाद राजनीतिक चर्चाएं और तेज हो गई हैं।
सूत्रों के अनुसार, कुछ नेताओं को आगामी विधानसभा चुनावों की तैयारियों में संगठनात्मक जिम्मेदारी देने पर विचार किया जा रहा है। विशेष रूप से पंजाब में पार्टी की रणनीति को मजबूत करने के उद्देश्य से कुछ वरिष्ठ नेताओं की भूमिका बदले जाने की संभावना जताई जा रही है।
सहयोगी दलों और नए सहयोगियों को मिल सकता है प्रतिनिधित्व
राजनीतिक सूत्रों का कहना है कि संभावित फेरबदल में सहयोगी दलों को भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया जा सकता है। महाराष्ट्र और अन्य राज्यों के सहयोगी दलों के कुछ नेताओं को मंत्रिपरिषद में शामिल किए जाने की संभावना व्यक्त की जा रही है।
इसके अलावा हाल के वर्षों में अन्य दलों से भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए कुछ नेताओं को भी सरकार में जिम्मेदारी मिलने की चर्चा है। हालांकि ऐसे किसी भी निर्णय पर अंतिम मुहर शीर्ष नेतृत्व की सहमति के बाद ही लगेगी।
राज्यपाल पदों पर भी हो सकते हैं बदलाव
सूत्रों का कहना है कि आने वाले महीनों में कुछ राज्यों के राज्यपालों का कार्यकाल पूरा होने वाला है। ऐसी स्थिति में मंत्रिपरिषद से बाहर होने वाले कुछ वरिष्ठ नेताओं को राज्यपाल की जिम्मेदारी दिए जाने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा रहा है।
राजनीतिक हलकों में इसे संगठन, सरकार और संवैधानिक पदों के बीच व्यापक संतुलन बनाने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
राष्ट्रपति से मुलाकातों के बाद तेज हुई अटकलें
हाल के दिनों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से अलग-अलग मुलाकातों के बाद मंत्रिपरिषद में फेरबदल की चर्चाओं ने और जोर पकड़ लिया है।
हालांकि सरकारी अधिकारियों ने इन मुलाकातों को नियमित शिष्टाचार भेंट बताया है और फेरबदल को लेकर किसी भी तरह की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।
अंतिम निर्णय पर टिकी निगाहें
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी महत्वपूर्ण राजनीतिक और प्रशासनिक फैसलों को अंतिम समय तक गोपनीय रखने के लिए जाने जाते हैं। इसलिए मंत्रिपरिषद में संभावित फेरबदल, विस्तार अथवा विभागों में बदलाव को लेकर तब तक कोई निश्चित निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता, जब तक सरकार या भारतीय जनता पार्टी की ओर से औपचारिक घोषणा नहीं कर दी जाती।
फिलहाल राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हैं, लेकिन अंतिम तस्वीर आधिकारिक निर्णय के बाद ही स्पष्ट होगी।


