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चीन की चुनौती का मुकाबला भारत-अमेरिका मिलकर ही कर सकते हैं: अमेरिकी सीनेटर स्टीव डेन्स

वॉशिंगटन, 30 जून। अमेरिकी सीनेटर स्टीव डेन्स ने कहा है कि चीन की बढ़ती तकनीकी और आर्थिक ताकत के बीच भारत और अमेरिका की रणनीतिक साझेदारी पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। उनका कहना है कि अमेरिका के साथ मिलकर काम करने वाला भारत ही दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है, जो चीन के विशाल नवाचार तंत्र, प्रतिभा और औद्योगिक क्षमता का प्रभावी मुकाबला कर सकता है। उन्होंने कहा कि यह साझेदारी केवल दोनों देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक स्थिरता, आर्थिक संतुलन और भविष्य की तकनीकी प्रतिस्पर्धा के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

वॉशिंगटन में आयोजित अमेरिका-भारत रणनीतिक साझेदारी मंच के नेतृत्व सम्मेलन को संबोधित करते हुए डेन्स ने भारत-अमेरिका संबंधों को इक्कीसवीं सदी की सबसे अहम रणनीतिक साझेदारियों में से एक बताया। इस अवसर पर उन्हें दोनों देशों के रिश्तों को मजबूत बनाने में योगदान के लिए सार्वजनिक सेवा सम्मान से भी सम्मानित किया गया। यह सम्मान सीनेटर मार्क वार्नर को भी प्रदान किया गया, हालांकि वे समारोह में उपस्थित नहीं हो सके।

भारत और अमेरिका की साझेदारी पूरी दुनिया के लिए अहम

कार्यक्रम के दौरान फेडएक्स के अध्यक्ष एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी राज सुब्रमण्यम के साथ बातचीत में डेन्स ने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच संबंध केवल द्विपक्षीय हितों तक सीमित नहीं हैं। उनका मानना है कि दोनों लोकतांत्रिक देशों का सहयोग वैश्विक आर्थिक व्यवस्था, सुरक्षा और तकनीकी विकास के लिए भी अत्यंत आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि विश्व व्यवस्था तेजी से बदल रही है और ऐसे समय में समान मूल्यों वाले देशों के बीच सहयोग पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है। भारत और अमेरिका की साझेदारी इसी दिशा में सबसे मजबूत आधार प्रदान करती है।

चीन की चुनौती पर रणनीतिक सोच की जरूरत

डेन्स ने कहा कि चीन के बढ़ते प्रभाव को केवल प्रतिस्पर्धा के रूप में देखने से काम नहीं चलेगा। अमेरिका को यह भी तय करना होगा कि किन देशों के साथ मिलकर दीर्घकालिक रणनीति तैयार की जाए। उनके अनुसार, भारत इस रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण साझेदार बनकर उभरता है।

उन्होंने कहा कि वॉशिंगटन में चीन से जुड़ी चुनौतियों पर काफी चर्चा होती है, लेकिन इस बात पर अपेक्षाकृत कम विचार किया जाता है कि उन चुनौतियों का प्रभावी समाधान किन साझेदारियों के माध्यम से संभव है। उनका मानना है कि भारत के साथ सहयोग इस दिशा में सबसे मजबूत विकल्प है।

भारत के प्रति भरोसे का उदाहरण

भारत और चीन के प्रति अपने दृष्टिकोण का अंतर स्पष्ट करते हुए डेन्स ने एक व्यक्तिगत अनुभव साझा किया। उन्होंने कहा कि जब वह चीन की यात्रा पर जाते हैं तो सुरक्षा कारणों से अपना मोबाइल फोन साथ नहीं ले जाते, जबकि भारत की यात्रा के दौरान ऐसा करने की आवश्यकता महसूस नहीं होती।

उन्होंने कहा कि यह केवल एक व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि दोनों देशों के प्रति उनके विश्वास और सुरक्षा संबंधी आकलन को भी दर्शाता है। उनके अनुसार, भारत अमेरिका का भरोसेमंद साझेदार है और दोनों देशों के बीच विश्वास लगातार मजबूत हुआ है।

चीन से पूरी तरह अलग होना संभव नहीं

सीनेटर डेन्स ने कहा कि अमेरिका के लिए चीन से पूरी तरह अलग हो जाना व्यावहारिक नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि दोनों देशों के बीच आर्थिक और व्यापारिक संबंध इतने व्यापक हैं कि पूर्ण दूरी संभव नहीं है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका को अपने रणनीतिक जोखिम कम करने होंगे और भरोसेमंद देशों के साथ आपूर्ति श्रृंखला तथा तकनीकी सहयोग को मजबूत करना होगा।

उन्होंने कहा कि भविष्य की रणनीति का उद्देश्य संबंध तोड़ना नहीं, बल्कि जोखिमों को कम करते हुए विश्वसनीय साझेदारियों का विस्तार करना होना चाहिए।

चीन के नवाचार तंत्र का मुकाबला करने में सक्षम है भारत

डेन्स ने कहा कि यदि चीन के विशाल नवाचार तंत्र, अनुसंधान क्षमता और औद्योगिक विस्तार का मुकाबला कोई देश कर सकता है तो वह भारत है। उन्होंने कहा कि अमेरिका और भारत के पास संयुक्त रूप से प्रतिभा, तकनीकी कौशल, वैज्ञानिक क्षमता और उद्यमिता की ऐसी ताकत है जो वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम है।

उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ने से नई तकनीकों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, उन्नत विनिर्माण, रक्षा उत्पादन और नवाचार के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति संभव है।

भरोसा ही मजबूत संबंधों की नींव

एशिया के अनेक देशों की यात्रा कर चुके डेन्स ने कहा कि किसी भी प्रभावी विदेश नीति की सबसे मजबूत नींव व्यक्तिगत संबंध और पारस्परिक विश्वास होते हैं। उन्होंने कहा कि नेताओं, नीति निर्माताओं और समाज के विभिन्न वर्गों के बीच सीधा संवाद दीर्घकालिक सहयोग का आधार बनता है।

उन्होंने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच वर्षों में जो विश्वास विकसित हुआ है, वही दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी को नई ऊंचाइयों तक ले जा रहा है।

केवल चर्चा नहीं, ठोस रणनीति की आवश्यकता

डेन्स ने कहा कि अमेरिका में चीन की चुनौती पर लगातार चर्चा होती है, लेकिन अब समय केवल विश्लेषण का नहीं, बल्कि ठोस रणनीतिक कदम उठाने का है। उन्होंने कहा कि यह तय करना आवश्यक है कि किन देशों के साथ मिलकर भविष्य की वैश्विक व्यवस्था को मजबूत बनाया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि भारत के साथ गहरा सहयोग केवल आर्थिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि वैश्विक सुरक्षा, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती के लिए भी अत्यंत आवश्यक है।

सार्वजनिक सेवा सम्मान से सम्मानित हुए डेन्स

सम्मेलन के दौरान अमेरिका-भारत रणनीतिक साझेदारी मंच के अध्यक्ष जॉन चैम्बर्स ने डेन्स का परिचय देते हुए कहा कि उन्होंने राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर भारत और अमेरिका के बीच संबंधों को मजबूत बनाने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई है।

उन्होंने कहा कि डेन्स की सबसे बड़ी विशेषता दीर्घकालिक भरोसेमंद संबंध स्थापित करने की क्षमता है। उन्होंने भारतीय नेताओं, अमेरिकी अधिकारियों और विभिन्न संस्थाओं के साथ मजबूत संवाद कायम किया है, जिससे दोनों देशों के संबंधों को नई दिशा मिली है।

चैम्बर्स ने नई दिल्ली की उनकी यात्राओं का भी उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने भारतीय नेतृत्व और अमेरिकी राजनयिकों के साथ विश्वास का मजबूत वातावरण तैयार किया।

चीन में शुरुआती अनुभव ने बदली सोच

स्टीव डेन्स ने अपने शुरुआती व्यावसायिक जीवन का उल्लेख करते हुए बताया कि उन्होंने उन्नीस सौ नब्बे के दशक में चीन में कार्य किया था। उस समय चीन की अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत छोटी थी, लेकिन अगले तीन दशकों में उसने अभूतपूर्व आर्थिक विस्तार किया।

उन्होंने कहा कि उस अनुभव ने उन्हें एशिया की बदलती आर्थिक शक्ति और वैश्विक प्रतिस्पर्धा की दिशा को समझने का अवसर दिया। उनके अनुसार, आज की परिस्थितियों में भारत तेज गति से उभरती ऐसी शक्ति है जो वैश्विक आर्थिक संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

वैश्विक कूटनीति में अमेरिका की भूमिका अहम

डेन्स ने मध्य एशिया और दक्षिण काकेशस क्षेत्र में अपने कूटनीतिक अनुभवों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि विभिन्न देशों के बीच संवाद और शांति प्रयासों में अमेरिका की भूमिका आज भी महत्वपूर्ण बनी हुई है।

उनके अनुसार, लोकतांत्रिक मूल्यों, स्वतंत्रता और खुले समाज की अवधारणा आज भी दुनिया के अनेक देशों के लिए प्रेरणा का स्रोत है और अमेरिका को इसी दिशा में अपनी भूमिका निभाते रहना चाहिए।

सार्वजनिक जीवन के बाद भी भारत से जुड़े रहेंगे

सीनेट छोड़ने की घोषणा कर चुके डेन्स ने कहा कि सार्वजनिक जीवन से अलग होने के बाद भी वह भारत-अमेरिका संबंधों और वैश्विक मुद्दों से जुड़े रहेंगे। उन्होंने कहा कि वह निजी क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभाते हुए दोनों देशों के बीच सहयोग को आगे बढ़ाने का प्रयास जारी रखेंगे।

उन्होंने कहा कि भारत के साथ बढ़ते संबंधों को लेकर वह अत्यंत उत्साहित हैं और भविष्य में भी इस दिशा में योगदान देना चाहते हैं।

भारतीय मूल के चिकित्सक का किया उल्लेख

अपने संबोधन के अंत में डेन्स ने एक भावनात्मक प्रसंग साझा किया। उन्होंने बताया कि कैंसर के इलाज के दौरान एक भारतीय मूल के चिकित्सक ने उनके पिता का सफल उपचार किया था। उन्होंने कहा कि यह अनुभव उनके परिवार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण रहा और इससे उन्हें भारतीय मूल के पेशेवरों की प्रतिभा और समर्पण को करीब से समझने का अवसर मिला।

उन्होंने कहा कि अमेरिका के विकास में भारतीय मूल के नागरिकों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है और विज्ञान, चिकित्सा, शिक्षा, उद्योग तथा प्रौद्योगिकी सहित अनेक क्षेत्रों में उनकी भूमिका लगातार बढ़ रही है।

बदलते वैश्विक परिदृश्य में बढ़ रहा भारत का महत्व

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे समय में जब दुनिया आपूर्ति श्रृंखला, प्रौद्योगिकी प्रतिस्पर्धा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अर्धचालक उद्योग और आर्थिक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर नई रणनीति बना रही है, भारत और अमेरिका की साझेदारी का महत्व लगातार बढ़ रहा है। इसी पृष्ठभूमि में स्टीव डेन्स का यह बयान दोनों देशों के बढ़ते रणनीतिक सहयोग और भविष्य की साझा वैश्विक भूमिका का स्पष्ट संकेत माना जा रहा है।

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