तेहरान, 20 जून। ईरानी गायिका परस्तू अहमदी, हिजाब विवाद, 74 कोड़ों की सजा, मानवाधिकार, ईरान की नैतिक पुलिस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे मुद्दे एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय बहस के केंद्र में आ गए हैं। 29 वर्षीय ईरानी गायिका परस्तू अहमदी को कथित तौर पर अनिवार्य हिजाब नियमों का उल्लंघन करते हुए सार्वजनिक प्रस्तुति देने के मामले में 74 कोड़ों की सजा सुनाई गई है। इस फैसले के बाद मानवाधिकार संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और शिक्षाविदों ने ईरान में महिलाओं के अधिकारों और सांस्कृतिक स्वतंत्रता को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं।
वायरल कॉन्सर्ट के बाद शुरू हुई कानूनी कार्रवाई
जानकारी के अनुसार, परस्तू अहमदी और उनकी प्रोडक्शन टीम के आठ सदस्यों ने वर्ष 2024 में उनके यूट्यूब चैनल पर लाइव-स्ट्रीम किए गए एक संगीत कार्यक्रम में हिस्सा लिया था। इस कार्यक्रम को ‘कारवांसेराय कॉन्सर्ट’ के नाम से जाना गया, जिसमें उन्होंने प्रसिद्ध देशभक्ति गीत ‘अज़ खून-ए जवानान-ए वतन’ प्रस्तुत किया था। कार्यक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ और बड़ी संख्या में लोगों ने इसे देखा।
हालांकि, इसी प्रस्तुति को लेकर ईरानी अधिकारियों ने कार्रवाई शुरू की। आरोप लगाया गया कि कार्यक्रम में अनिवार्य हिजाब नियमों का पालन नहीं किया गया और इंटरनेट पर ऐसी सामग्री प्रसारित की गई जिसे अधिकारियों ने सार्वजनिक शालीनता के खिलाफ बताया।
अदालत का फैसला और अतिरिक्त प्रतिबंध
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और कानूनी सूत्रों के अनुसार, कोम प्रांत की एक आपराधिक अदालत ने परस्तू अहमदी और कुछ अन्य संगीतकारों को 74 कोड़ों की सजा सुनाई है। इसके अलावा उन पर देश छोड़ने और कलात्मक गतिविधियों में भाग लेने को लेकर दो वर्षों तक प्रतिबंध लगाने का भी आदेश दिया गया है।
हालांकि न्यायपालिका की आधिकारिक समाचार एजेंसी द्वारा इस फैसले का पूर्ण विवरण अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन अदालत से जुड़े दस्तावेजों में कथित तौर पर इंटरनेट पर ‘अश्लील और अनैतिक सामग्री’ प्रकाशित करने और सार्वजनिक मर्यादा को ठेस पहुंचाने जैसे आरोपों का उल्लेख किया गया है।
मानवाधिकार संगठनों ने उठाए सवाल
मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि यह मामला केवल एक कलाकार की सजा का नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और महिलाओं के अधिकारों से जुड़ा व्यापक मुद्दा है। अमेरिका स्थित Center for Human Rights in Iran की एडवोकेसी निदेशक Bahar Ghandehari ने कहा कि यह सजा दर्शाती है कि ईरान में मानवाधिकारों की स्थिति में कोई वास्तविक सुधार नहीं हुआ है।
उन्होंने आरोप लगाया कि एक ओर सरकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी सकारात्मक छवि प्रस्तुत करने का प्रयास करती है, वहीं दूसरी ओर कलाकारों और महिलाओं पर प्रतिबंधात्मक कार्रवाई जारी है। उनके अनुसार, यह विरोधाभास सरकारी दावों और जमीनी वास्तविकता के बीच अंतर को उजागर करता है।
शिक्षाविदों और बुद्धिजीवियों की प्रतिक्रिया
Fatemeh Shams, जो University of Pennsylvania में फारसी साहित्य की प्रोफेसर हैं, ने इस मामले पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने सोशल मीडिया मंच एक्स पर लिखा कि महिलाओं और राजनीतिक कैदियों के खिलाफ हो रही कार्रवाई को नजरअंदाज कर केवल शांति की बात करना पर्याप्त नहीं है।
उन्होंने कहा कि सच्ची शांति केवल युद्ध या हिंसा की अनुपस्थिति नहीं होती, बल्कि वह स्थिति होती है जिसमें लोगों को अपने विचार व्यक्त करने, शिक्षा प्राप्त करने, काम करने, कला प्रस्तुत करने और अपनी जीवनशैली चुनने की स्वतंत्रता प्राप्त हो। उनके अनुसार, जब तक महिलाओं और निर्दोष नागरिकों को अपने अधिकारों के प्रयोग के लिए दंडित किया जाता रहेगा, तब तक स्थायी और न्यायपूर्ण शांति की कल्पना अधूरी रहेगी।
वैश्विक स्तर पर बढ़ी बहस
परस्तू अहमदी का मामला अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं की स्वतंत्रता, सांस्कृतिक अभिव्यक्ति और मानवाधिकारों को लेकर चल रही बहस का हिस्सा बन गया है। मानवाधिकार संगठनों का मानना है कि इस तरह के मामलों से यह प्रश्न फिर सामने आता है कि आधुनिक समाजों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सरकारी नियमों के बीच संतुलन किस प्रकार स्थापित किया जाए। वहीं, इस फैसले ने ईरान की नीतियों और वहां महिलाओं की स्थिति को लेकर वैश्विक चर्चा को और तेज कर दिया है।



