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इलाहाबाद उच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण फैसला: मायके की मदद मिलने से पत्नी गुजारा भत्ता के अधिकार से वंचित नहीं हो सकती

प्रयागराज, 30 जून। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने गुजारा भत्ता से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि आर्थिक संकट के समय पत्नी को उसके मायके से सहायता मिलना, पति को उसके भरण-पोषण की कानूनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करता। अदालत ने कहा कि माता-पिता द्वारा की गई आर्थिक सहायता को पत्नी की आय नहीं माना जा सकता और इसे पति के वैधानिक दायित्व का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।

इसी टिप्पणी के साथ उच्च न्यायालय ने बुलंदशहर की परिवार अदालत के उस आदेश को संशोधित कर दिया, जिसमें पत्नी के गुजारा भत्ता के दावे को खारिज कर दिया गया था। साथ ही अदालत ने दोनों नाबालिग बच्चों के लिए निर्धारित भरण-पोषण राशि भी बढ़ा दी।

परिवार अदालत के आदेश को दी थी चुनौती

यह मामला उस समय उच्च न्यायालय पहुंचा जब पत्नी और उसके दो नाबालिग बच्चों ने परिवार अदालत के दिसंबर 2023 के आदेश के खिलाफ आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर की। परिवार अदालत ने पत्नी को गुजारा भत्ता देने से इनकार करते हुए केवल दोनों बच्चों के लिए तीन-तीन हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण राशि निर्धारित की थी।

उच्च न्यायालय ने मामले की सुनवाई के बाद पाया कि परिवार अदालत ने उपलब्ध तथ्यों और कानून के उद्देश्य के अनुरूप निर्णय नहीं दिया।

मायके का सहयोग पति की जिम्मेदारी समाप्त नहीं करता

न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की एकल पीठ ने अपने निर्णय में कहा कि संकट की स्थिति में यदि किसी महिला के माता-पिता उसकी सहायता करते हैं, तो इससे पति की कानूनी जिम्मेदारी समाप्त नहीं हो जाती।

अदालत ने कहा कि भरण-पोषण संबंधी कानून का उद्देश्य आर्थिक रूप से असहाय पत्नी और बच्चों को संरक्षण देना है। इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि मायके से मिल रही सहायता के कारण पत्नी को पति से गुजारा भत्ता नहीं मिलना चाहिए।

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि माता-पिता की आय को पत्नी की व्यक्तिगत आय नहीं माना जा सकता।

पत्नी ने लगाए थे उत्पीड़न और परित्याग के आरोप

याचिकाकर्ता महिला ने अपने आवेदन में आरोप लगाया था कि विवाह के बाद पति और ससुराल पक्ष के लोगों ने उसका उत्पीड़न किया। उसने यह भी कहा कि सेना से सेवानिवृत्त उसके पति ने वैवाहिक संबंध समाप्त कर दिए और बाद में किसी अन्य महिला से विवाह करने की जानकारी दी।

महिला का आरोप था कि जनवरी 2020 में उसके साथ मारपीट की गई और उसे दोनों बच्चों सहित घर से निकाल दिया गया। इसके बाद से वह अपने मायके में रह रही है और अपने माता-पिता पर निर्भर है।

पति ने लगाए थे अलग आरोप

दूसरी ओर पति ने अदालत में कहा कि पत्नी बिना किसी उचित कारण के घर छोड़कर चली गई थी। उसने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी के अन्य व्यक्तियों के साथ अवैध संबंध हैं।

पति का कहना था कि सेना में सेवा के दौरान उसके वेतन से हर महीने पत्नी और बच्चों के लिए राशि काटी जाती थी। सेवानिवृत्ति के बाद वह केवल पेंशन पर निर्भर है और उसके पास आय का कोई अन्य स्रोत नहीं है।

केवल आरोपों के आधार पर अधिकार नहीं छीना जा सकता

उच्च न्यायालय ने पति द्वारा लगाए गए अवैध संबंधों के आरोपों पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि इन आरोपों के समर्थन में कोई स्वतंत्र गवाह, विश्वसनीय दस्तावेज या ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया।

पीठ ने स्पष्ट किया कि केवल संदेह, आरोप या चरित्र पर सवाल उठाने भर से किसी पत्नी को गुजारा भत्ता के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। कानून के अनुसार ऐसा तभी संभव है जब अवैध संबंधों का आरोप विश्वसनीय साक्ष्यों से सिद्ध हो।

परिवार अदालत की कानूनी व्याख्या पर जताई असहमति

सुनवाई के दौरान पत्नी की ओर से यह तर्क दिया गया कि परिवार अदालत ने भरण-पोषण संबंधी प्रावधानों की भावना के विपरीत जाकर मामले का निर्णय किया। याचिका में कहा गया कि अदालत ने इस मामले को वैवाहिक विवाद और क्रूरता के मुकदमे की तरह देखा, जबकि इसका मूल उद्देश्य पत्नी और बच्चों के भरण-पोषण का अधिकार सुनिश्चित करना था।

उच्च न्यायालय ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि भरण-पोषण संबंधी मामलों में कानून की मूल भावना सामाजिक सुरक्षा और संरक्षण प्रदान करना है।

बच्चों के भरण-पोषण की राशि भी बढ़ाई

उच्च न्यायालय ने परिवार अदालत द्वारा दोनों बच्चों के लिए निर्धारित तीन-तीन हजार रुपये प्रतिमाह की राशि को भी अपर्याप्त माना। अदालत ने कहा कि वर्तमान समय में शिक्षा, भोजन, वस्त्र, पुस्तकों, परिवहन, चिकित्सा और अन्य आवश्यक खर्चों को देखते हुए यह राशि बच्चों की न्यूनतम जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

इसी आधार पर अदालत ने दोनों बच्चों के लिए भरण-पोषण राशि बढ़ाकर चार-चार हजार रुपये प्रतिमाह कर दी।

पत्नी को भी मिलेगा गुजारा भत्ता

उच्च न्यायालय ने 17 जून को दिए अपने निर्णय में पति को निर्देश दिया कि वह पत्नी को प्रतिमाह पांच हजार रुपये गुजारा भत्ता प्रदान करे। इसके साथ ही दोनों नाबालिग बच्चों के लिए चार-चार हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण राशि देने का भी आदेश दिया।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला भरण-पोषण संबंधी मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने अपने निर्णय के माध्यम से स्पष्ट किया है कि मायके से मिलने वाली सहायता को पति की कानूनी जिम्मेदारी का विकल्प नहीं माना जा सकता और बिना ठोस साक्ष्यों के लगाए गए आरोपों के आधार पर किसी महिला को उसके वैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।

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