Top 5 This Week

spot_img

Related Posts

Homeलेख-विचारमोदी के वाराणसी और भागवत...

मोदी के वाराणसी और भागवत के नागपुर में मुरझाया कमल, बीजेपी के लिए खतरे की घंटी?

सत्ता के शिखर पर बैठी भारतीय जनता पार्टी के लिए दो शहरों से आए चुनावी नतीजे महज दो सीटों की हार नहीं हैं। एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र वाराणसी है, तो दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का मुख्यालय नागपुर। विधान परिषद चुनावों में वाराणसी में समाजवादी पार्टी ने बीजेपी को शिकस्त दी, जबकि नागपुर में कांग्रेस ने लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की। कमल के लिए ये दोनों आंगन राजनीतिक रूप से बेहद अहम हैं। यही वजह है कि इन नतीजों ने बीजेपी के भीतर और राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है। सवाल है कि क्या पार्टी की चुनावी चमक के पीछे मतदाताओं की नाराजगी भी आकार ले रही है?

महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के विधान परिषद चुनावों में बीजेपी को भले ही कुल मिलाकर सीटों के मामले में बढ़त मिली हो, लेकिन नागपुर और वाराणसी के परिणामों का प्रतीकात्मक महत्व कहीं बड़ा है। खास बात यह है कि इन चुनावों में शिक्षक और स्नातक मतदाताओं की भूमिका अहम रही। यह वह वर्ग है, जो राजनीतिक दलों के दावों, सरकारों के कामकाज और नीतियों का मूल्यांकन अपेक्षाकृत अलग नजरिए से करता है। ऐसे में इन नतीजों को पढ़े-लिखे मतदाताओं के बीच बीजेपी के प्रति संभावित असंतोष के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, इसे व्यापक जनमत का निर्णायक प्रमाण मानना जल्दबाजी होगी।

नागपुर के सियासी संदेश के मायने

नागपुर की हार बीजेपी के लिए इसलिए भी असहज करने वाली है, क्योंकि यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्यालय होने के साथ-साथ मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का गृहक्षेत्र भी है। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की लंबे समय तक रही विधान परिषद सीट से जुड़ा यह क्षेत्र बीजेपी के राजनीतिक प्रभाव का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता रहा है। यहां कांग्रेस का लगातार दूसरी बार जीतना बताता है कि स्थानीय चुनावों में राजनीतिक विरासत और संगठनात्मक प्रभाव के बावजूद मुकाबला एकतरफा नहीं रह गया है।

राजनीतिक विश्लेषक निरंजन परिहार के मुताबिक, नागपुर में कांग्रेस की जीत और बीजेपी की हार को नए नजरिए से देखने की जरूरत है। इस चुनाव में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं थी और न ही नितिन गडकरी की कोई सीधी भूमिका सामने आई। इसलिए परिहार की राय में इस परिणाम को संघ या गडकरी की राजनीतिक स्थिति पर सीधे फैसले की तरह देखना उचित नहीं होगा। हालांकि, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के गृहक्षेत्र में बीजेपी की हार उनके लिए राजनीतिक असहजता का विषय जरूर है।

इस नतीजे का असली संदेश स्थानीय संगठन, उम्मीदवारों की स्वीकार्यता और मतदाताओं से संवाद की प्रभावशीलता में छिपा हो सकता है। बीजेपी के लिए चुनौती यह समझने की है कि मजबूत राजनीतिक आधार वाले क्षेत्र में भी मतदाताओं का एक खास वर्ग उससे दूरी क्यों बना रहा है।

वाराणसी में मोदी के गढ़ की चुनौती

वाराणसी का परिणाम अपने प्रतीकात्मक अर्थों के कारण और अधिक चर्चा में है। नरेंद्र मोदी लगातार तीसरी बार इस संसदीय क्षेत्र से निर्वाचित हुए हैं। उनके कार्यकाल में शहर में बुनियादी ढांचे, धार्मिक पर्यटन और सार्वजनिक सुविधाओं से जुड़े कई विकास कार्य हुए हैं। इसके बावजूद विधान परिषद चुनाव में बीजेपी की हार ने यह सवाल उठाया है कि क्या विकास कार्यों का राजनीतिक लाभ हर चुनाव और हर मतदाता वर्ग में समान रूप से दिखाई देता है?

समाजवादी पार्टी की जीत को विपक्ष अपनी रणनीति की सफलता के रूप में पेश कर सकता है। बीजेपी के लिए यह परिणाम इसलिए महत्वपूर्ण है कि उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच स्थानीय स्तर पर संगठन और मतदाता संपर्क की परीक्षा भी जारी है। मोदी के संसदीय क्षेत्र में विपक्ष की सफलता राजनीतिक संदेश जरूर देती है, लेकिन इसे विधानसभा चुनाव के परिणाम की भविष्यवाणी नहीं माना जा सकता।

राजनीतिक पर्यवेक्षक हरिगोविंद विश्वकर्मा का कहना है, “विधान परिषद चुनाव में मतदाताओं का वर्ग विशेष होने के कारण बीजेपी के लिए परिणाम अपेक्षित नहीं रहे। लेकिन इन नतीजों के आईने में विधानसभा चुनाव का पूरा आकलन करना जल्दबाजी होगी। शिक्षक और स्नातक मतदाताओं की प्राथमिकताएं आम चुनाव के व्यापक मतदाता वर्ग से अलग हो सकती हैं।”

हार छोटी, मगर सवाल बड़े

नागपुर और वाराणसी के नतीजे बीजेपी के लिए सत्ता गंवाने का तत्काल संकेत नहीं, बल्कि राजनीतिक आत्ममंथन का अवसर हैं। वरिष्ठ पत्रकार संदीप सोनवलकर के अनुसार, इन चुनावों में मतदाताओं की संख्या और सामाजिक संरचना सीमित हो सकती है, मगर उनका संदेश नजरअंदाज करना भी आसान नहीं है। खासकर तब, जब दोनों स्थान पार्टी के सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रतीकों से जुड़े हों।

अब सवाल यह है कि क्या बीजेपी इन नतीजों को स्थानीय चुनावों की सामान्य उठापटक मानकर आगे बढ़ेगी या संगठन और मतदाताओं के बीच बदलते रिश्तों की पड़ताल करेगी? क्योंकि चुनावी राजनीति में कई बार बड़ी चुनौती सीटों की संख्या से नहीं, बल्कि उन जगहों से मिलती है जहां हार का प्रतीकात्मक अर्थ बहुत बड़ा होता है।

मोदी के वाराणसी और भागवत के नागपुर में मुरझाया कमल फिलहाल विपक्ष की जीत से ज्यादा बीजेपी के लिए एक चेतावनी की तरह दिखाई देता है। यह चेतावनी कितनी गंभीर है, इसका जवाब अगले चुनाव देंगे।

Popular Articles