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6 जून, बाबा मायाराम

उत्तराखंड के जड़धार गांव में जंगलों के संरक्षण, जल और मिट्टी बचाने, पारंपरिक खेती को जीवित रखने तथा देशी बीजों के संवर्धन का उल्लेखनीय कार्य वर्षों से किया जा रहा है। यह प्रयास आज भी निरंतर जारी है। इसके साथ ही पशुओं के प्रति आत्मीयता, गोबर गैस जैसे स्थानीय ऊर्जा स्रोतों का उपयोग और श्रम-आधारित जीवनशैली इस गांव को एक आदर्श ग्राम की पहचान देते हैं।

टिहरी गढ़वाल जिले में हेंवल नदी के किनारे बसा यह गांव प्राकृतिक सौंदर्य और सामुदायिक जीवन का सुंदर उदाहरण है। कुछ वर्ष पहले मुझे इस गांव को करीब से देखने का अवसर मिला था। यहां घर एक-दूसरे से पर्याप्त दूरी पर बने हैं, जिससे प्रकृति और मानवीय जीवन के बीच संतुलन सहज रूप से दिखाई देता है।

पर्यावरण दिवस पर मैं पर्यावरण कार्यकर्ता विजय जड़धारी और उनके काम को याद करना चाहूंगा, जिनकी पर्यावरण संरक्षण की पहल प्रेरणादायक है।

उत्तराखंड के जड़धार में जंगल बचाने, पानी-मिट्टी का संरक्षण, परम्परागत खेती और देशी बीज बचाने का अनूठा काम हुआ है और आज भी जारी है। इसके अलावा, पशुओं से प्रेम, गोबर गैस जैसे स्थानीय ऊर्जा के स्रोत, हाथ से काम करने की परम्परा ऐसे काम हैं, जो एक आदर्श गांव की जरूरत है।

यह पर्यावरण कार्यकर्ता विजय जड़धारी का गांव है। उनसे कई बार मेरा मिलना हुआ है, उनके साथ लम्बी यात्राएं की हैं। आज उनके गांव के पर्यावरण संरक्षण पर बात करना चाहूंगा, जिससे पर्यावरण को समग्रता में देखा जा सके, उसे बचाया जा सके।

यह गांव टिहरी गढ़वाल जिले में हेंवल नदी के किनारे बसा है। मैं इस गांव में कुछ साल पहले गया था। गांव में मकान दूर-दूर बसे हैं। कुछ पहाड़ी पर तो कुछ तराई में। पहाड़ी पर बसे घर दूर-दूर हैं, इसका कारण समतल जमीन का नहीं होना है। जहां पर कुछ समतल जमीन मिली, वहीं पर घर बनाकर रहने लगे। तराई में घनी आबादी है।

मैं जड़धार गांव में विजय जड़धारी के घर रुका वे चिपको आन्दोलन के कार्यकर्ता रहे हैं। वे आज बीज बचाओ आन्दोलन की मुहिम चला रहे हैं। पानी के बहते स्रोत को पुनर्जीवित करने में उनकी पहल बहुत ही महत्वपूर्ण है।

देसी बीज और खेती बचाने के लिए बारहनाजा ( मिश्रित खेती) की पद्धति को बढ़ावा देने का श्रेय भी उन्हीं को है। वे कहते हैं कि बदलती जलवायु और मौसम के दौर में बारहनाजा बहुत ही उपयोगी है। पौष्टिक अनाज मंडुआ, झंगोरा प्रतिकूल जलवायु में भी बचे रहते हैं। इन फसलों को लेकर आज शासकीय स्तर पर भी योजनाएं बनाई जा रही हैं।

यहां के उजड़े जंगल को भी उन्होंने ग्रामीणों की मदद से हरा-भरा किया है। जिसे आज देखने के लिए कई लोग आते हैं। वनविभाग की कई टीमें भी इसे देखने आ चुकी हैं। इसके लिए उन्होंने उजड़ चुके जंगल को कुछ दिनों विश्राम दिया। यानी जंगल को नुकसान से बचाने के लिए कुछ पाबंदियां लगाईं। मवेशियों को आने-जाने पर रोक लगाई और जंगल की रखवाली की।

सत्तर के दशक के उत्तरार्ध में उत्तराखण्ड का यह क्षेत्र देश-दुनिया में इसलिए मशहूर हो गया जब यहां के लोग जंगल को कटने से बचाने के लिए पेड़ों से चिपक गए। इस अनूठे आन्दोलन में महिलाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था।

विजय जड़धारी चिपको आन्दोलन के प्रमुख कार्यकर्ताओं में एक थे। इसके बाद उन्होंने जड़धार गांव का जंगल बचाने का जतन किया जिससे आज परम्परागत पानी के स्रोत सदानीरा हैं और इससे पूरे गांव को बारह महीने पानी मिल रहा है। जंगल बचाने का यह अनूठा काम कई बरसों से किया जा रहा है।

वे आगे बताते हैं कि जड़धार गांव के लोगों ने मिलकर तय किया कि जंगल को बचाया जाए। इसके लिए एक वन सुरक्षा समिति बनाई गई। जंगल से किसी भी तरह के हरे पेड़, ठूंठ, यहां तक कि कंटीली हरी झाड़ियों को काटने पर रोक लगाई गई। कोई भी व्यक्ति यदि अवैध रूप से हरी टहनी या झाड़ी काटता है तो उस पर जुर्माना लगाया जाएगा, ऐसा तय किया गया।

कुछ समय के लिए पशु चरने पर भी रोक लगाई गई। कोई व्यक्ति वनों को किसी प्रकार नुकसान न पहुंचाए, यह सुनिश्चित किया गया। यह काम गांव की जरूरतों को ध्यान में रखकर किया गया जिसमें जरूरत पड़ने पर थोड़ा बहुत फेरबदल किया जा सके। जंगल की रखवाली के लिए वन सुरक्षा समिति ने दो वनसेवक नियुक्त किए, जिन्हें गांववाले पैसे एकत्र कर कुछ आंशिक मानदेय देने लगे। जो पैसा जुर्माने से एकत्र होता उसे वनसेवकों को मानदेय के रूप में दे दिया जाता। हालांकि मानदेय की राशि कम थी, फिर भी वनसेवकों ने यह काम अपना समझकर किया।

वनसेवक रहे हुकुमसिंह बताते हैं कि जंगल की रखवाली के लिए हर महीने 300 रूपए मिलते थे। 20-22 साल तक जंगल की रखवाली करते रहे। पहले 3-4 फुट छोटे पौधे थे। रूखा-सूखा जंगल था। बाद में 15 फीट ऊंचे पेड़ हो गए। जंगल में बांज, बुरांस, काफल, बमोरा, खाकसी के पेड़ बहुतायत में थे। बांज के पेड़ से चारा, पत्ती व खाद मिलती है। यह पेड़ मिट्टी को बांधने एवं जलस्रोतों की रक्षा का काम भी अन्य पेड़ों के मुकाबले ज्यादा करता है। इसका जंगल ही पानी का सदानीरा स्रोत हैं। गर्मी के मौसम में भी इसका ठंडा जल रहता है।

वे आगे बताते हैं कि शंकुधारी वृक्ष चीड़, देवदार यदि कट गए तो इनमें दुबारा कल्ले (नई कोंपलें) नहीं आते हैं। जबकि बांज, बुरांस, काफल, अथांर, घिघारू, किनगोड़, खाकसी, बमोर घने होते हैं। और उनमें 1-2 साल में ही नए कल्ले आने शुरू हो गए। झाड़ियां आ गईं। जलाऊ लकड़ियां मिलने लगीं। इससे उत्साह बढ़ने लगा।

वन सुरक्षा समिति की समय-समय पर बैठकें होती थीं। कभी 3 महीने में, कभी 6 महीने मे बैठकों का दौर जारी रहा। बंद वन जागरूकता कार्यक्रम भी चलता रहा। 5-7 साल में जो जलस्रोत पूरी तरह सूख गए थे, उनमें पानी आ गया। वे कल-कल बहने लगे। इस गांव के आसपास दो दर्जन जलस्रोत हैं। नए पेड़ों ने पहाड़ को हरियाली से ढंक दिया।

बांज, बुरास, काफल के पुराने ठूंठों पर फिर नई शाखाएं फूटने लगीं। अंयार, बंमोर, किनगोड हिंसर, साकिना, धौला, सिंस्यारू, खाकसी आदि पेड़-पौधे दिखाई देने लगे। और आज ये पेड़ लहलहा रहे हैं। बारिश को समाहित करने की शक्ति पेड़ों में होती है, इससे भूक्षरण व भूस्खलन भी कम हो गया। गाय-भैंसों के नीचे बिछाने के लिए पत्ती व घास चारे व ईंधन की सुविधा हो, इसकी कोशिश की जाने लगी।

इसी प्रकार विजय जड़धारी बारहनाजा की मिश्रित खेती करते हैं। बारहनाजा का अर्थ है बारह अनाज। किन्तु इसमें अनाज ही नहीं, दलहन, तिलहन, शाक भाजी, मसाले व रेशा आदि भी शामिल हैं। बारहनाजा में 12 फसलें हों, यह जरूरी नहीं। इसमें 20 फसलें भी हो सकती हैं।

उनके घर पूरी तरह अपने खेतों में उगाए गए अनाज से भोजन बनता है। झंगोरा का भात, बाजरा की घी चुपड़ी रोटी, राजमा, मीठा करेले की सब्जी का स्वाद ही अलग था। तीन दिन पूरी तरह जैविक भोजन हमेशा याद रहेगा। ठण्ड में गुनगुनी धूप की तपन महसूस होगी, जब हमारे आज के भागमभाग वाली जीवनशैली से ऊब होगी।

जड़धारी बताते हैं कि यहां हर घर से कोई-न-कोई एक नौकरी में है। लेकिन इससे खेती के प्रति लोगों का मोह कम नहीं हुआ। जो लोग घर में हैं, वे मेहनत से पीछे नहीं हटते। वे मुझे जड़धार की एक महिला के घर ले गए। इस परिवार का पूरा ध्यान अपनी परंपरागत खेती पर है। वे बारहनाजा की खेती करते हैं।

कुल मिलाकर, यह कहा जा सकता है कि जड़धार में जंगल बचाने, पानी-मिट्टी का संरक्षण, परम्परागत खेती और देशी बीज बचाने का अनूठा काम हुआ है और आज भी जारी है। इसके अलावा, पशुओं से प्रेम, गोबर गैस जैसे स्थानीय ऊर्जा के स्रोत, हाथ से काम करने की परम्परा ऐसे काम हैं, जो एक आदर्श गांव की जरूरत जड़धार एक प्रेरणादायक गांव है, जो अनुकरणीय भी है। क्या हम इस दिशा में आगे बढ़ना चाहेंगे?

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