एवियन (फ्रांस), 18 जून (वेब वार्ता)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फ्रांस में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान “सुरक्षित, तेज और प्रभावी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के रोलआउट को सुनिश्चित करना” विषय पर आयोजित विशेष सत्र को संबोधित किया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आज वैश्विक समुदाय के लिए सबसे महत्वपूर्ण और परिवर्तनकारी तकनीकों में से एक बन चुका है, जिसने मानव जीवन के लगभग हर क्षेत्र को प्रभावित किया है।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि एआई की वास्तविक परीक्षा इसकी तकनीकी क्षमता में नहीं, बल्कि इस बात में है कि यह सामान्य नागरिकों के जीवन को कितना सशक्त और सरल बना पाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि एआई का विकास मानव-केंद्रित होना चाहिए और इसका लाभ समाज के हर वर्ग तक समान रूप से पहुंचना आवश्यक है। यदि यह तकनीक केवल कुछ चुनिंदा समूहों या देशों तक सीमित रह जाती है, तो यह वैश्विक असमानता को और बढ़ा सकती है।
उन्होंने साइबर स्पेस को लेकर भारत के दृष्टिकोण को भी साझा किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत का मानना है कि साइबर स्पेस को वैश्विक सार्वजनिक हित को बढ़ावा देने वाला एक साझा मंच होना चाहिए, न कि विभाजन का कारण। इसके लिए यह जरूरी है कि एआई और डिजिटल तकनीकों तक समावेशी और व्यापक पहुंच सुनिश्चित की जाए, ताकि सभी लोकतांत्रिक देश अपनी महत्वपूर्ण सूचना अवसंरचना की सुरक्षा कर सकें और बढ़ते साइबर खतरों का प्रभावी तरीके से सामना कर सकें।
अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने एआई के जिम्मेदार विकास को लेकर कई महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए। उन्होंने कहा कि एआई सिस्टम को “सुरक्षित-डिजाइन” (Safety by Design) के सिद्धांत पर आधारित होना चाहिए, ताकि सुरक्षा उपाय तकनीक के मूल ढांचे में ही शामिल किए जा सकें। इससे भविष्य में होने वाले जोखिमों और दुरुपयोग की संभावनाओं को कम किया जा सकता है।
इसके साथ ही उन्होंने वैश्विक सहयोग पर जोर देते हुए कहा कि एआई के लिए साझा मानक, परीक्षण ढांचे और रेगुलेटरी सैंडबॉक्स विकसित किए जाने चाहिए। इससे एक ओर जहां नवाचार को बढ़ावा मिलेगा, वहीं दूसरी ओर आवश्यक नियामक संतुलन भी बना रहेगा। उन्होंने कहा कि तकनीकी विकास और नियमन को एक साथ आगे बढ़ाना ही स्थायी समाधान है।
प्रधानमंत्री मोदी ने डीपफेक, गलत सूचना, साइबर धोखाधड़ी और डिजिटल सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियों पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि आज के समय में यह सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है कि एआई का दुरुपयोग न हो और यह तकनीक समाज में भ्रम या अस्थिरता फैलाने का माध्यम न बने। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत सहयोग और साझा रणनीति की आवश्यकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि एआई का लाभ केवल विकसित देशों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसका लाभ विकासशील और कम विकसित देशों तक भी पहुंचना चाहिए। यह तकनीक समावेशी विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और शासन व्यवस्था में व्यापक सुधार का माध्यम बन सकती है।
अपने संबोधन के अंत में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि यदि एआई को जिम्मेदारी, पारदर्शिता और वैश्विक सहयोग के साथ विकसित किया जाए, तो यह मानवता के लिए एक अत्यंत शक्तिशाली और सकारात्मक परिवर्तनकारी साधन बन सकता है, जो आने वाले समय में दुनिया को एक नई दिशा प्रदान करेगा।



