अंकारा, 09 जुलाई। ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका और डेनमार्क के बीच कूटनीतिक तनाव एक बार फिर बढ़ता दिखाई दे रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नाटो शिखर सम्मेलन के दौरान रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण आर्कटिक द्वीप ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण की आवश्यकता दोहराई, जिसके बाद डेनमार्क की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया सामने आई है।
डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने स्पष्ट कर दिया है कि ग्रीनलैंड किसी भी कीमत पर बिक्री के लिए नहीं है और उसकी संप्रभुता से जुड़े मुद्दे पर किसी प्रकार की बातचीत या सौदेबाजी नहीं की जा सकती।
ट्रंप ने ग्रीनलैंड को बताया अमेरिका की सुरक्षा के लिए अहम
नाटो शिखर सम्मेलन के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि ग्रीनलैंड अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने दावा किया कि आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन की बढ़ती गतिविधियों को देखते हुए इस द्वीप का रणनीतिक महत्व और बढ़ गया है।
ट्रंप ने कहा कि ग्रीनलैंड पर अमेरिका का नियंत्रण केवल अमेरिकी हितों के लिए नहीं, बल्कि वैश्विक सुरक्षा के लिए भी आवश्यक है। उन्होंने यह भी टिप्पणी की कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका द्वारा ग्रीनलैंड को डेनमार्क को वापस करना सही निर्णय नहीं था।
अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि आर्कटिक क्षेत्र में सुरक्षा, संसाधनों और रणनीतिक स्थिति के कारण ग्रीनलैंड का महत्व लगातार बढ़ रहा है।
डेनमार्क ने संप्रभुता पर दिया कड़ा संदेश
ट्रंप के बयान के बाद डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने साफ कर दिया कि ग्रीनलैंड को लेकर कोई समझौता नहीं होगा। उन्होंने कहा कि ग्रीनलैंड डेनमार्क साम्राज्य के अंतर्गत एक स्वायत्त क्षेत्र है और वहां के लोगों के अधिकारों का सम्मान किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है और किसी भी संप्रभु राष्ट्र की क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान किया जाना चाहिए। डेनमार्क की प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि नाटो के प्रत्येक सदस्य देश की संप्रभुता और सुरक्षा महत्वपूर्ण है।
ग्रीनलैंड के भविष्य का फैसला जनता करेगी
ग्रीनलैंड के नेताओं ने भी अमेरिकी दावे को स्वीकार नहीं किया है। ग्रीनलैंड के विदेश मंत्री मुते एगेडे ने कहा कि क्षेत्र का भविष्य केवल वहां रहने वाले लोग तय करेंगे।
उन्होंने स्पष्ट किया कि ग्रीनलैंड की जनता को अपने भविष्य के संबंध में निर्णय लेने का पूरा अधिकार है। स्थानीय नेतृत्व का कहना है कि किसी भी बाहरी दबाव के बजाय जनता की इच्छा सर्वोपरि होगी।
आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा बना बड़ा कारण
ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका की रुचि का मुख्य कारण उसका भौगोलिक और सामरिक महत्व माना जाता है। यह द्वीप आर्कटिक क्षेत्र में स्थित है और उत्तरी अटलांटिक तथा ध्रुवीय मार्गों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है।
इसके अलावा ग्रीनलैंड में मौजूद प्राकृतिक संसाधन, विशेष रूप से महत्वपूर्ण खनिज, वैश्विक शक्तियों के लिए आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बदलती वैश्विक राजनीति में आर्कटिक क्षेत्र का महत्व तेजी से बढ़ रहा है।
रूस और चीन की बढ़ती गतिविधियों के बीच अमेरिका अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत करना चाहता है। यही कारण है कि ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी रुचि लगातार बनी हुई है।
नाटो सहयोग और अमेरिकी सैन्य भूमिका पर भी चर्चा
ट्रंप ने यह भी संकेत दिया कि यदि सहयोगी देश अमेरिका के सुरक्षा दृष्टिकोण का समर्थन नहीं करते हैं, तो यूरोप में अमेरिकी सैन्य उपस्थिति पर पुनर्विचार किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि पिछले कुछ दशकों में यूरोप की परिस्थितियां काफी बदल गई हैं और अमेरिका को अपनी सैन्य प्रतिबद्धताओं की समीक्षा करने का अधिकार है।
ट्रंप ने यूरोप की अप्रवासन और ऊर्जा नीतियों पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि इन क्षेत्रों में सतर्कता की आवश्यकता है।
पहले भी ग्रीनलैंड खरीदने की इच्छा जता चुके हैं ट्रंप
यह पहली बार नहीं है जब डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को लेकर अपनी रुचि दिखाई है। अपने पहले कार्यकाल के दौरान भी उन्होंने इस द्वीप को खरीदने की इच्छा व्यक्त की थी।
उस समय भी डेनमार्क और ग्रीनलैंड दोनों ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था और कहा था कि ग्रीनलैंड कोई संपत्ति नहीं है जिसे खरीदा या बेचा जा सके।
अमेरिका-डेनमार्क संबंधों पर पड़ सकता है असर
ग्रीनलैंड विवाद ने अमेरिका और डेनमार्क के बीच संबंधों में नई चुनौती पैदा कर दी है। हालांकि दोनों देश नाटो के सहयोगी हैं, लेकिन संप्रभुता और क्षेत्रीय अधिकारों के मुद्दे पर मतभेद स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में ग्रीनलैंड को लेकर कूटनीतिक बातचीत जारी रह सकती है। अमेरिका जहां इसे सुरक्षा और रणनीतिक हितों से जोड़ रहा है, वहीं डेनमार्क और ग्रीनलैंड इसे संप्रभुता और आत्मनिर्णय के अधिकार का विषय मान रहे हैं।
ग्रीनलैंड का मुद्दा अब केवल क्षेत्रीय विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह आर्कटिक राजनीति, वैश्विक सुरक्षा और बड़ी शक्तियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा का प्रतीक बन चुका है।


