एवियन (फ्रांस), 18 जून (वेब वार्ता)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फ्रांस में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की से मुलाकात की। यह बैठक वैश्विक मंच पर चल रहे तनावपूर्ण हालात के बीच संवाद और कूटनीतिक प्रयासों को आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
मुलाकात के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर इसकी जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि भारत और यूक्रेन के बीच हाल के वर्षों में सहयोग और आपसी संपर्क में लगातार वृद्धि हुई है, जो विभिन्न क्षेत्रों में द्विपक्षीय साझेदारी के रूप में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है। प्रधानमंत्री ने कहा कि दोनों देशों के संबंध अब अधिक व्यावहारिक और बहुआयामी होते जा रहे हैं।
बैठक के दौरान भारत और यूक्रेन के बीच द्विपक्षीय सहयोग के कई पहलुओं पर विस्तार से चर्चा हुई। इनमें व्यापार, निवेश, कृषि, शिक्षा और तकनीकी सहयोग जैसे क्षेत्रों को विशेष रूप से शामिल किया गया। दोनों नेताओं ने इस बात पर सहमति व्यक्त की कि मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए आर्थिक संबंधों को पुनः मजबूत करना आवश्यक है, ताकि सहयोग को युद्ध-पूर्व स्तर तक बहाल किया जा सके।
प्रधानमंत्री मोदी ने बातचीत के दौरान यह भी स्पष्ट किया कि भारत हमेशा शांति के पक्ष में खड़ा रहा है और आगे भी मानवीय मूल्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता देता रहेगा। उन्होंने कहा कि किसी भी संघर्ष का समाधान संवाद और कूटनीति के माध्यम से ही संभव है, और भारत इस दिशा में हर संभव योगदान देने के लिए प्रतिबद्ध है।
उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि वैश्विक स्थिरता के लिए यह आवश्यक है कि सभी देश मिलकर सहयोगात्मक दृष्टिकोण अपनाएं और आपसी मतभेदों को बातचीत के जरिए हल करें। प्रधानमंत्री के अनुसार, भारत की विदेश नीति हमेशा से संतुलन, संवाद और शांति पर आधारित रही है।
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की के साथ यह बैठक दोनों देशों के संबंधों को नई दिशा देने वाली मानी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की उच्चस्तरीय वार्ताएं न केवल द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करती हैं, बल्कि वैश्विक मंच पर शांति स्थापना के प्रयासों को भी गति देती हैं।
जी-7 सम्मेलन के दौरान हुई यह मुलाकात ऐसे समय में हुई है जब दुनिया के कई हिस्सों में संघर्ष और तनाव की स्थिति बनी हुई है। ऐसे में भारत और यूक्रेन के बीच यह संवाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए एक सकारात्मक संकेत के रूप में देखा जा रहा है, जो भविष्य में सहयोग और स्थिरता की संभावनाओं को और मजबूत कर सकता है।



