मुंबई, 18 जून (वेब वार्ता)। राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता अभिनेता पंकज त्रिपाठी ने भारतीय हैंडलूम और हस्तशिल्प परंपरा को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए अपने नए हैंडलूम वेंचर ‘टुलो’ की शुरुआत की है। यह पहल केवल एक व्यावसायिक परियोजना नहीं, बल्कि भारतीय बुनकरों और कारीगरों की समृद्ध विरासत को संरक्षित करने तथा उन्हें आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त बनाने का प्रयास है।
बंगाली भाषा के शब्द ‘टुलो’, जिसका अर्थ हैंडलूम कॉटन होता है, से प्रेरित इस ब्रांड का उद्देश्य भारत की सदियों पुरानी बुनाई परंपरा को आधुनिक उपभोक्ताओं तक पहुंचाना है। साथ ही यह देशभर के कारीगर समुदायों के लिए नए अवसर तैयार करने और लोगों को स्वदेशी तथा हस्तनिर्मित उत्पादों के प्रति जागरूक करने का भी कार्य करेगा।
खादी और भारतीय हस्तनिर्मित वस्त्रों के प्रति अपने विशेष लगाव के लिए पहचाने जाने वाले पंकज त्रिपाठी लंबे समय से भारतीय हैंडलूम उद्योग के समर्थन में सक्रिय रहे हैं। विभिन्न सार्वजनिक कार्यक्रमों, सोशल मीडिया अभियानों और वस्त्र मंत्रालय के साथ मिलकर चलाए गए जागरूकता कार्यक्रमों में उनकी भागीदारी रही है। भारतीय वस्त्र परंपरा से उनका गहरा जुड़ाव ही उन्हें इस क्षेत्र में एक उद्यमी के रूप में आगे आने के लिए प्रेरित करता रहा है।
‘टुलो’ की अवधारणा प्रसिद्ध स्टाइलिस्ट विनीत चौहान के साथ मिलकर विकसित की गई है। विनीत कई वर्षों से पंकज त्रिपाठी के साथ काम कर रहे हैं और भारतीय हस्तशिल्प तथा पारंपरिक वस्त्रों के प्रति उनकी रुचि भी उतनी ही गहरी है। दोनों की साझा सोच ने इस पहल को आकार दिया, जिसका लक्ष्य केवल उत्पाद बेचना नहीं बल्कि भारतीय बुनाई कला की कहानी दुनिया तक पहुंचाना है।
ब्रांड के लॉन्च के अवसर पर पंकज त्रिपाठी ने कहा कि ‘टुलो’ उनके लिए सिर्फ एक व्यवसाय नहीं, बल्कि एक भावनात्मक यात्रा है। उन्होंने कहा कि यह उन लाखों कारीगरों को समर्पित है, जिनके हाथों ने पीढ़ियों से भारत की वस्त्र विरासत को जीवित रखा है।
उन्होंने बताया कि फिल्मों की शूटिंग के दौरान देश के विभिन्न हिस्सों की यात्रा करते समय उन्हें भारतीय हैंडलूम उद्योग को करीब से देखने और समझने का अवसर मिला। इन अनुभवों ने उनके मन पर गहरा प्रभाव छोड़ा और उन्हें इस क्षेत्र से और अधिक जुड़ने के लिए प्रेरित किया।
पंकज ने याद करते हुए कहा कि मध्य प्रदेश के चंदेरी में शूटिंग के दौरान उन्होंने देखा कि वहां लगभग हर घर में महिलाएं हैंडलूम पर साड़ियां और अन्य वस्त्र बुनने का कार्य कर रही थीं। यह दृश्य उन्हें बेहद आकर्षित करता था क्योंकि वहां बुनाई केवल एक रोजगार नहीं थी, बल्कि एक परंपरा और जीवनशैली का हिस्सा थी, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती आ रही थी।
उन्होंने कहा कि इसी तरह जब भी उन्हें बनारस जाने का अवसर मिला, तो वे वहां के बुनकर समुदायों के बीच समय बिताते थे। कारीगरों को अपने हाथों से बेहद बारीक और खूबसूरत कपड़े तैयार करते देखना उन्हें किसी जादू से कम नहीं लगता था। आधुनिक मशीनों और बड़े पैमाने पर उत्पादन के दौर में भी इतनी जीवंत और समृद्ध हस्तनिर्मित परंपरा का बने रहना उन्हें हमेशा आश्चर्यचकित करता था।
पंकज त्रिपाठी का मानना है कि दुनिया में शायद ही कोई दूसरा देश होगा जहां हैंडलूम और हस्तशिल्प की इतनी विविध और समृद्ध परंपरा आज भी जीवंत रूप में मौजूद हो। उन्होंने कहा कि जितना अधिक उन्होंने इस क्षेत्र को समझा, उतना ही उनका जुड़ाव इससे गहरा होता गया।
उन्होंने कहा कि हैंडलूम केवल कपड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संस्कृति, समुदाय, इतिहास, धैर्य और मानवीय कौशल का प्रतीक है। हर बुनाई अपने क्षेत्र की पहचान को दर्शाती है, हर डिजाइन अपने साथ एक ऐतिहासिक कहानी लेकर चलती है और हर परिधान में किसी कारीगर की मेहनत, समर्पण और संवेदनाएं छिपी होती हैं।
हालांकि उन्होंने इस बात पर चिंता भी जताई कि भारतीय संस्कृति की इस अमूल्य धरोहर को जीवित रखने वाले अनेक बुनकर समुदाय आज भी आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। ऐसे में उन्हें लगा कि यदि वे अपनी पहचान और लोकप्रियता के माध्यम से इन कारीगरों के लिए जागरूकता बढ़ाने तथा नए अवसर उपलब्ध कराने में योगदान दे सकते हैं, तो उन्हें यह प्रयास अवश्य करना चाहिए।
पंकज ने कहा कि खादी और हैंडलूम उत्पादों के साथ उनका जुड़ाव समय के साथ और मजबूत हुआ है। ‘टुलो’ के माध्यम से वे भारतीय हस्तशिल्प का उत्सव मनाना चाहते हैं और ऐसा मंच तैयार करना चाहते हैं, जहां कारीगरों को वह सम्मान, पहचान और समर्थन मिल सके, जिसके वे वास्तव में हकदार हैं।
उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि लोग हस्तनिर्मित उत्पादों की वास्तविक कीमत को समझें। मशीन से तैयार उत्पादों की तुलना में एक हस्तनिर्मित वस्त्र के पीछे कहीं अधिक समय, धैर्य, कौशल और समर्पण जुड़ा होता है। ‘टुलो’ का उद्देश्य लोगों को इसी मूल्य से दोबारा जोड़ना है।
पंकज त्रिपाठी ने बताया कि यह विचार उनके और विनीत चौहान के बीच हुई अनगिनत चर्चाओं के दौरान विकसित हुआ। भारतीय वस्त्रों के प्रति उनका साझा प्रेम उन्हें एक ऐसे मंच की कल्पना तक ले गया, जो केवल सुंदर उत्पादों का प्रदर्शन न करे, बल्कि उनके पीछे की मानवीय कहानियों और सांस्कृतिक विरासत को भी सामने लाए।
उन्होंने कहा कि उनका सपना देश के विभिन्न हिस्सों के कारीगर समुदायों के साथ मिलकर काम करना और उनकी उत्कृष्ट कला को व्यापक बाजार तथा नए उपभोक्ताओं तक पहुंचाना है। उनका मानना है कि इससे न केवल कारीगरों की आय बढ़ेगी, बल्कि भारत की पारंपरिक बुनाई कला को भी नई पहचान मिलेगी।
पंकज त्रिपाठी ने अंत में कहा कि भारत की हैंडलूम परंपरा हजारों वर्षों पुरानी है और यह देश की सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक धरोहरों में से एक है। ‘टुलो’ इसी विरासत को सहेजने, कारीगरों को सशक्त बनाने और आने वाली पीढ़ियों तक भारतीय शिल्पकला की विशिष्ट पहचान पहुंचाने की दिशा में एक छोटी लेकिन सार्थक पहल है। उन्होंने विश्वास जताया कि यदि इस प्रयास के माध्यम से कुछ कारीगरों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाया जा सके और अधिक लोग स्वदेशी उत्पादों को अपनाने के लिए प्रेरित हों, तो यही इस पहल की सबसे बड़ी सफलता होगी।



