Top 5 This Week

spot_img

Related Posts

Homeलेख-विचारभविष्य की आहट: विदेशी शक्तियों...

भविष्य की आहट: विदेशी शक्तियों और भितरघातियों की जुगलबंदी विफल

डॉ. रवीन्द्र अरजरिया

लोकतंत्र में असहमति और शांतिपूर्ण प्रदर्शन नागरिक अधिकारों का मूल आधार होते हैं, परंतु जब असहमति की आड़ में विदेशी धन, अत्याधुनिक तकनीक और राष्ट्रविरोधी तत्वों का एक अतिआधुनिक ताना-बाना तैयार कर देश की संप्रभुता को चुनौती दी जाए, तब यह विरोध नहीं बल्कि एक सुनियोजित छद्म-युद्ध बन जाता है। देश की राजधानी के जंतर-मंतर पर घटित हालिया घटनाक्रम इसी खतरनाक वैश्विक और आंतरिक जुगलबंदी का एक नया रूप था। इतिहास गवाह है कि विगत कुछ वर्षों में भारत की आर्थिक और सामरिक प्रगति को बाधित करने के लिए ऐसी ही वैश्विक साजिशें बार-बार रची गई हैं, परंतु सुरक्षा एजेंसियों के अभेद्य समन्वय और सरकार की दूरदर्शी रणनीति ने इस चक्रव्यूह को एक बार फिर ध्वस्त कर दिया।

जंतर-मंतर का घटनाक्रम कोई अचानक हुआ आंदोलन नहीं था, बल्कि इसके पीछे वही वैश्विक टूलकिट इकोसिस्टम सक्रिय था, जिसका भंडाफोड़ वर्ष 2021 के कृषक आंदोलन के समय पोएटिक जस्टिस फाउंडेशन जैसे कनाडा आधारित संगठनों की भूमिका के दौरान हुआ था। वर्ष 2019-2020 के हांगकांग प्रदर्शनों में चीन विरोधी अभियानों के लिए ऐसा ही दृश्य सामने आया था। वर्ष 2020 के दिल्ली दंगों तथा शाहीन बाग प्रदर्शनों में भीड़ जुटाने के लिए भी ऐसे ही प्रयास किए गए थे, जिन्हें जंतर-मंतर पर पुनः दोहराया गया।

इस बार पारंपरिक सोशल मीडिया पर एजेंसियों की कड़ी निगरानी को मात देने के लिए सुनियोजित योजना के तहत बिटचैट, ब्रिजफाई और ब्रायर जैसे मेश-नेटवर्किंग तथा एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म्स का सहारा लिया गया। ये ऐप्स बिना इंटरनेट कनेक्शन के केवल वाई-फाई और ब्लूटूथ के पीयर-टू-पीयर नेटवर्क पर काम करते हैं। इनका इस्तेमाल वर्ष 2019 के म्यांमार आंदोलन और बेलारूस के विरोध प्रदर्शनों में गोपनीय संदेश भेजने के लिए किया गया था।

जंतर-मंतर पर भी इसी तकनीक के जरिए सीमापार के आकाओं द्वारा देश के अलग-अलग कोनों से आए असामाजिक तत्वों और स्लीपर सेल्स को रियल-टाइम निर्देश दिए जा रहे थे। दिल्ली पुलिस की जांच में यह बात सामने आई है कि हालिया प्रदर्शनों के दौरान भ्रम और फर्जी खबरें फैलाने वाले कई सोशल मीडिया अकाउंट्स वही थे, जो ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी भारत विरोधी और भ्रामक जानकारी फैलाने में सक्रिय थे।

जंतर-मंतर प्रदर्शन की आड़ में देशव्यापी सांप्रदायिक दंगे भड़काना, सरकार को पंगु बनाना तथा बांग्लादेश और नेपाल जैसी परिस्थितियां उत्पन्न करना उद्देश्य बताया जा रहा था। स्थानीय स्तर पर राजनीतिक और वैचारिक खाद-पानी देने के लिए वही चेहरे निरंतर जंतर-मंतर पर मौजूद रहे, जो 26 जनवरी 2021 को लाल किले पर हुई हिंसक घटनाओं और भीमा कोरेगांव मामले से जुड़े अर्बन नक्सल नेटवर्क से संबंधित रहे हैं।

सत्ता की लिप्सा में अंधे कुछ राजनीतिक घटकों और असामाजिक-माफिया तत्वों ने इन देशविरोधी ताकतों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष संरक्षण प्रदान किया। राजनीतिक संरक्षण प्राप्त इन तत्वों का इतिहास हमेशा से राष्ट्रहित के विरोध में खड़े होने का रहा है, चाहे वह कश्मीर में धारा 370 के उन्मूलन का विरोध हो या फिर नागरिकता संशोधन अधिनियम यानी सीएए के खिलाफ भ्रम फैलाकर हिंसा भड़काने के प्रयास।

वर्ष 2020 में शाहीन बाग और उत्तर-पूर्वी दिल्ली के दंगों में स्थानीय स्लीपर सेल्स, भड़काऊ भाषणों और हवाला फंडिंग के माध्यम से सांप्रदायिक तनाव पैदा किया गया था, जिस पर सुरक्षा एजेंसियों ने कार्रवाई करते हुए कई वित्तीय स्रोतों पर शिकंजा कसा। वर्ष 2021 के गणतंत्र दिवस पर लाल किला हिंसा के दौरान भ्रामक टूलकिट और सोशल मीडिया अफवाहों का सहारा लेकर ऐतिहासिक स्मारकों और राष्ट्रीय गरिमा पर प्रहार किया गया था, जिसकी जांच में कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए।

जंतर-मंतर का हालिया घटनाक्रम भी इसी श्रृंखला की अगली कड़ी के रूप में देखा जा रहा है, जहां इंटरनेट रहित मेश-नेटवर्किंग ऐप्स और विदेशी फंडिंग के माध्यम से राष्ट्रीय प्रतीक क्षेत्र को निशाना बनाने की साजिश की बात सामने आई।

हालिया घटनाक्रम पर नजर डालें तो काकरोच का जन्म अमेरिका की धरती से हुआ। डीप स्टेट ने साइबर दिग्गजों और नेटवर्किंग माफियाओं के साथ मिलकर विश्व में महत्वपूर्ण स्थान की ओर बढ़ते भारत के विरुद्ध षड्यंत्र रचा। आतंकी संगठनों, विपक्षी दलों से जुड़े अपराधियों, राष्ट्रविरोधी स्लीपर सेल्स, भितरघातियों सहित कट्टरपंथी तत्वों को सक्रिय किया गया।

आंदोलन की शुरुआत में चंद लोगों के साथ पूर्व आप पदाधिकारी अभिजीत भगवान दीपके को अचानक भारी समर्थन मिलने लगा। मंच से राष्ट्रविरोधी नारे लगाए गए। सनातन पर आपत्तिजनक टिप्पणियां की गईं। धारा 370 के समर्थन में आवाजें उठीं। एक संप्रदाय विशेष के पक्ष में नारे लगाए गए। भारी पथराव और पुलिसकर्मियों पर हमले की घटनाएं सामने आईं। कुख्यात अपराधियों, गंभीर मामलों में आरोपित लोगों और असामाजिक तत्वों का जमावड़ा बढ़ता चला गया।

षड्यंत्र के तहत राजधानी के साथ-साथ देश के विभिन्न शहरों को भी अराजकता की आग में झोंकने के उद्देश्य से चेहरे ढककर समूहों के पहुंचने की बातें सामने आईं। अपशब्दों और भड़काऊ बयानों की प्रतिस्पर्धा देखने को मिली। जातिवादी उन्माद फैलाने, सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने और राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के प्रयास किए गए। टुकड़े-टुकड़े गैंग जैसी गतिविधियों के आरोप भी लगाए गए। धमकियों का दौर चला—संसद उखाड़ देंगे, नीतियां संसद से नहीं सड़कों से बनेंगी, नेपाल-बांग्लादेश जैसी स्थिति बना देंगे जैसे बयान दिए गए।

नीट पेपर लीक, परीक्षा में गड़बड़ी और शिक्षा प्रणाली में सुधार जैसे मुद्दों की आड़ में तोड़फोड़, आगजनी और आपराधिक कृत्य किए जाने के आरोप लगे। वास्तविकता यह है कि भारत का विश्व मंच पर निरंतर बढ़ता कद, वैश्विक संकटों के दौरान देश की मजबूत आपूर्ति श्रृंखला और संसद के वर्तमान सत्र में प्रस्तुत किए जाने वाले विभिन्न विधेयकों को प्रभावित करने के उद्देश्य से भी ऐसे प्रयासों की आशंका व्यक्त की गई।

आयकर (संशोधन) विधेयक, सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक, जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास (संशोधन) विधेयक, विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक यानी एफसीआरए विधेयक और विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक जैसे प्रस्तावित कानूनों को रोकने के लिए विदेशी प्रभावों से प्रेरित अस्थिरता फैलाने की आशंका जताई गई।

21वीं सदी में भारत के खिलाफ लड़े जा रहे इस पांचवीं पीढ़ी के युद्ध का मुकाबला केवल पारंपरिक पुलिस बल से नहीं, बल्कि मजबूत इच्छाशक्ति, रणनीतिक सोच और तकनीकी श्रेष्ठता से ही किया जा सकता है। सरकार के कदमों ने न केवल संभावित राष्ट्रीय संकट को टालने का प्रयास किया है, बल्कि यह संदेश भी दिया है कि भारत अपनी संप्रभुता और सुरक्षा से समझौता नहीं करेगा।

ऐसे समय में आम नागरिकों को भी पूरे घटनाक्रम का विवेकपूर्ण विश्लेषण करना होगा। काट-छांट कर बनाए गए वीडियो, भ्रामक संदेश और अपुष्ट समाचारों से बचते हुए शब्दों के मर्म, भाषा के प्रस्तुतिकरण, हावभाव और घटनास्थल पर मौजूद लोगों के व्यवहार को समझना आवश्यक है।

गृह मंत्रालय और केंद्रीय जांच एजेंसियों के अनुसार, विगत पांच वर्षों में भारत विरोधी गतिविधियों में शामिल होने और विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम यानी एफसीआरए के नियमों के उल्लंघन के कारण 6,000 से अधिक संदिग्ध एनजीओ और वैश्विक थिंक-टैंक के लाइसेंस रद्द किए गए हैं। इसके बावजूद हवाला नेटवर्क और शेल कंपनियों के जरिए करोड़ों रुपये की अवैध धनराशि भारत के भीतर अस्थिरता फैलाने के लिए लगातार झोंकी जा रही है।

प्राथमिक जांच आख्या में स्पष्ट हुआ है कि जंतर-मंतर पर अराजकता फैलाने के लिए विदेशी फंडिंग का एक बड़ा हिस्सा शेल कंपनियों के माध्यम से जुटाया गया। इससे भी अधिक चिंता का विषय यह है कि इस तंत्र में सीमापार के लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों के डिजिटल विंग ने भी अपनी घुसपैठ बना ली थी। यह वही खतरनाक नेटवर्क है, जिसने वर्ष 1993 के मुंबई बम धमाकों से लेकर वर्ष 2008 के 26/11 के हमलों को अंजाम दिया था। विगत कई वर्षों से कश्मीर में अतिआधुनिक आतंकवाद को बढ़ावा देने में भी इन्हीं संगठनों का हाथ रहा है।

इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नई आहट के साथ फिर मुलाकात होगी।

Popular Articles