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सब्जी बाड़ी: पोषण, परंपरा और आत्मनिर्भरता की हरित विरासत


बाबा मायाराम

बारिश का मौसम आ गया है। खेती-बाड़ी की तैयारी चल रही है। मिट्टी की सौंधी खुशबू वातावरण में घुल रही है। सूखे पेड़ों में हरे पत्ते आने लगे हैं। धरती पर हरियाली की चादर बिछने लगी है। सूखी नदियों में फिर से पानी बढ़ गया है। ऐसे समय मुझे बारिश के मौसम में लगने वाली उन सब्जियों की याद आती है, जिनसे घर में ताजी हरी सब्जियां उपलब्ध हो जाती थीं। हालांकि सब्जी बाड़ी की परंपरा कुछ कमजोर हुई है, फिर भी देश के कई हिस्सों में यह आज भी जीवित है। आज मैं इसी परंपरा पर बात करना चाहता हूं, ताकि हम अपनी पुरानी अच्छी परंपराओं को समझ सकें और उन्हें जीवित रख सकें।

मुझे अपने गांव की याद आती है, जहां लोग बारिश से पहले घरों की मरम्मत करते थे, ताकि पानी घर के भीतर न आए। रास्तों को दुरुस्त किया जाता था, जिससे आवागमन में परेशानी न हो। ईंधन के लिए लकड़ियों का इंतजाम कर लिया जाता था। मवेशियों के लिए भूसा और चारे की व्यवस्था भी पहले से कर ली जाती थी।

इसी प्रकार, बारिश के पहले बाड़ियों में देसी सब्जियां उगाई जाती थीं। हर साल सब्जियों के बीज बचाकर रखे जाते थे और बारिश शुरू होते ही उन्हें बाड़ियों में बो दिया जाता था। कुछ ही दिनों में हरी-भरी सब्जियां तैयार होने लगती थीं। घरों की छतों और बाड़ों पर सब्जियों की बेलें फैल जाती थीं। फल आने लगते थे और उनके भार से बाड़े भी टेढ़े-मेढ़े हो जाते थे।

एक समय हमारे गांव में घरों के पीछे स्थित बाड़ियों में कई तरह की हरी सब्जियां, मौसमी फल और मोटे अनाज लगाए जाते थे। भटा, टमाटर, हरी मिर्च, अदरक, भिंडी, सेमी (बल्लर), मक्का, ज्वार जैसी फसलें आम थीं। मुनगा, नींबू, बेर और अमरूद बच्चों के पोषण के महत्वपूर्ण स्रोत होते थे। इन बाड़ियों में न अलग से सिंचाई की जरूरत पड़ती थी और न ही अतिरिक्त खाद की। घर में रोजमर्रा के उपयोग से निकलने वाला पानी ही सब्जियों की सिंचाई के लिए पर्याप्त होता था। इनमें अदरक और हल्दी जैसे औषधीय पौधे भी लगाए जाते थे।

देसी बीजों के संरक्षण में जुटे नरेश विश्वास ‘बीजों की रिश्तेदारी’ नामक एक कार्यक्रम चला रहे हैं। इसका उद्देश्य देसी बीजों को बचाना, उनका आपसी आदान-प्रदान करना तथा इन अनाजों और सब्जियों से बने व्यंजनों की प्रदर्शनी आयोजित करना है, ताकि इस परंपरा को बढ़ावा मिले और यह फिर से आम जीवन का हिस्सा बन सके।

नरेश विश्वास ने मंडला-डिंडौरी के बैगाचक क्षेत्र के बैगा और पातालकोट के भारिया आदिवासियों के बीच लुप्त हो चुके देसी बीजों को खोजकर उन्हें फिर से उपलब्ध कराया है। इसमें अनेक प्रकार की देसी सब्जियों के बीज शामिल हैं। बाड़ियों में सब्जियों के साथ देसी अनाज भी लगाए जाते हैं। ‘सिकिया’ ऐसा ही एक अनाज है, जिसे लोग लगभग भूल चुके थे, लेकिन अब मंडला में फिर से इसकी खेती होने लगी है। इसी प्रकार बाजरे की एक देसी किस्म उनके पास है, जिसमें रोएं होते हैं। इससे चिड़ियां उसे कम नुकसान पहुंचा पाती हैं और फसल सुरक्षित रहती है।

बिलासपुर जिले में ‘जनस्वास्थ्य सहयोग’ संस्था ने भी सब्जी बाड़ी को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। संस्था छोटे बच्चों के लिए ‘फुलवारी’ (झूलाघर) संचालित करती है, जहां बच्चों को ताजा, गरम और पौष्टिक भोजन दिया जाता है।

इन फुलवारियों में सब्जी बाड़ियां भी विकसित की गई हैं, जिससे बच्चों को हरी सब्जियां उपलब्ध हो सकें। यहां पालक, मैथी, लाल भाजी और धनिया जैसी पत्तीदार सब्जियां उगाई जाती हैं। इनकी पत्तियों को दाल-चावल की खिचड़ी में मिलाकर बच्चों को खिलाया जाता है। यह उनके पोषण आहार का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इन बाड़ियों में अलग से पानी देने की जरूरत नहीं पड़ती। बच्चों के हाथ धुलाने में उपयोग होने वाला पानी ही सब्जियों की सिंचाई के लिए पर्याप्त होता है। संस्था ‘जेवनार मेले’ भी आयोजित करती है, जिनमें महिलाएं देसी व्यंजन बनाने की पारंपरिक विधियां साझा करती हैं।

छत्तीसगढ़ के गांवों, कस्बों और शहरों के आसपास आज भी सब्जी बाड़ियां देखने को मिलती हैं। सब्जी बाजारों में महिलाएं ताजी हरी सब्जियां बेचती नजर आती हैं। फुटपाथों पर सजी हरी-भरी सब्जियों की ढेरियां इस परंपरा की जीवंतता का प्रमाण हैं।

हरी पत्तीदार सब्जियों की विविधता के मामले में छत्तीसगढ़ समृद्ध है। यहां जैव विविधता के साथ संस्कृति का भी गहरा संबंध है। अनेक सब्जियों पर आधारित लोकगीत गाए जाते हैं और उनसे जुड़ी लोककथाएं भी प्रचलित हैं। यह दर्शाता है कि जैव विविधता, संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं।

दक्षिण भारत के राज्यों में जैविक खेती और जैविक सब्जियों का चलन काफी बढ़ा है। तमिलनाडु, केरल और तेलंगाना जैसे राज्यों में किसानों से बातचीत के दौरान मैंने उनके खेतों और बाड़ियों को देखा है।

कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ जिले में ‘वनस्री’ संस्था ने देसी बीजों और सब्जियों के संरक्षण को बढ़ावा दिया है। इसकी शुरुआत वर्ष 2001 में सुनीता राव ने की थी। अपनी पढ़ाई के दौरान पांडिचेरी में उनकी मुलाकात जापान के प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक मासानोबू फुकुओका से हुई थी, जिनके प्राकृतिक खेती के प्रयोग बाद में पूरी दुनिया में चर्चित हुए।

वनस्री से जुड़ी महिला किसान जंगल-आधारित घरेलू कृषि-बागवानी का अनूठा कार्य कर रही हैं। इससे उन्हें खाद्य पदार्थ, चारा, ईंधन, रेशा और औषधियां प्राप्त होती हैं। यह बेहतर स्वास्थ्य और टिकाऊ जीवनशैली का आधार है तथा प्रकृति से जुड़ने का एक सशक्त माध्यम भी।

सुनीता राव बताती हैं, “इसकी शुरुआत अनौपचारिक रूप से हुई। जब भी हम किसी के घर जाते थे, वे सबसे पहले हमें अपना सब्जी बगीचा दिखाते थे और उसके बाद घर के भीतर ले जाते थे। उनके लिए यह बगीचा बहुत महत्वपूर्ण होता था। यह घर के बाहर छोटे से हिस्से में विकसित किया जाता था। इसमें मिश्रित फसलें, विविध प्रकार की सब्जियां, फल-फूल, जंगली कंद-मूल और औषधीय पौधे शामिल होते थे।”

वे आगे कहती हैं, “ये महिलाएं पूरी तरह आत्मनिर्भर और स्वावलंबी हैं। वे अपने बगीचों में सब्जियां और फल उगाती हैं, फसल कटाई के बाद बीजों का चयन करती हैं, उन्हें सुरक्षित रखती हैं और उनका आदान-प्रदान करती हैं। वे परंपरागत बीजों की धरोहर और उनसे जुड़े ज्ञान को सहेजकर रखती हैं।”

कुल मिलाकर, सब्जी बाड़ी की परंपरा कई मायनों में महत्वपूर्ण है। इससे ताजी, हरी और रसायन-मुक्त सब्जियां उपलब्ध होती हैं। घर की जैविक खाद का बेहतर उपयोग होता है। बागवानी के माध्यम से शारीरिक श्रम भी होता है, जो स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है। इसके साथ ही देसी बीजों और उनसे जुड़े पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण भी होता है। परिवार के सब्जी खर्च में कमी आती है और पोषण सुरक्षा भी सुनिश्चित होती है। इसलिए यह एक अत्यंत उपयोगी और प्रेरणादायक परंपरा है, जिसे संरक्षित और प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। क्या हम इस दिशा में आगे बढ़ना चाहेंगे?

Image source: pexels.com

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