बेंगलुरु, 16 जून (वेब वार्ता)। कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खड़गे ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की कानूनी स्थिति, संगठनात्मक पारदर्शिता और वित्तीय जवाबदेही को लेकर कई सवाल उठाए हैं। उन्होंने संघ से उसके पंजीकरण, फंडिंग के स्रोतों और आय-व्यय से संबंधित जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की है। खड़गे का कहना है कि जब देश में गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ), ट्रस्ट और कंपनियों के लिए कानूनी पंजीकरण और वित्तीय विवरण देना अनिवार्य है, तो इतने बड़े स्तर पर कार्य करने वाले संगठन के लिए अलग व्यवस्था क्यों होनी चाहिए।
पारदर्शिता को लेकर उठाए सवाल
प्रियांक खड़गे ने एक पत्र के माध्यम से आरएसएस से स्पष्ट करने को कहा है कि वह किन कानूनी प्रावधानों के तहत बिना औपचारिक पंजीकरण के कार्य कर रहा है। उनका तर्क है कि सार्वजनिक जीवन और सामाजिक गतिविधियों से जुड़े संगठनों के लिए जवाबदेही और पारदर्शिता आवश्यक है।
खड़गे ने कहा कि किसी भी संस्था की वैधता और उसके संचालन की पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए उसके कानूनी ढांचे और वित्तीय स्रोतों की जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यदि अन्य संगठनों पर नियामकीय नियम लागू होते हैं, तो आरएसएस को इससे अलग क्यों रखा जाए।
मोहन भागवत ने खारिज की मांग
दूसरी ओर, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने इन मांगों को राजनीतिक प्रेरित बताते हुए सिरे से खारिज कर दिया है। केरल के त्रिशूर में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि संघ को किसी प्रकार के पंजीकरण की आवश्यकता नहीं है और इसकी तुलना उन्होंने हिंदू समाज की परंपरागत संरचना से की।
भागवत ने कहा कि जिन संस्थाओं को सरकारी सहायता या अनुदान की आवश्यकता होती है, उन्हें औपचारिक पंजीकरण कराना पड़ता है। उन्होंने दावा किया कि आरएसएस को सरकार से किसी प्रकार की आर्थिक सहायता नहीं मिलती और सरकार उसके अस्तित्व तथा गतिविधियों से पूरी तरह परिचित है।
राजनीतिक उद्देश्य का लगाया आरोप
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि संगठन को लेकर संदेह पैदा करने की कोशिशें नई नहीं हैं और अतीत में भी ऐसे प्रयास होते रहे हैं। उनके अनुसार, संघ के खिलाफ उठाए जा रहे ये सवाल राजनीतिक लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से प्रेरित हैं।
भागवत ने यह भी याद दिलाया कि 1950 के दशक में संघ ने अपना लिखित संविधान सरकार को उपलब्ध कराया था और तब से उसके कार्यकलाप सार्वजनिक रूप से संचालित होते रहे हैं। उन्होंने कहा कि संगठन समाज सेवा, राष्ट्र निर्माण और सांस्कृतिक जागरूकता के क्षेत्र में लंबे समय से कार्य कर रहा है।
बहस ने पकड़ा राजनीतिक रंग
खड़गे और भागवत के बयानों के बाद यह मुद्दा राजनीतिक और वैचारिक बहस का विषय बन गया है। एक ओर पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग उठ रही है, तो दूसरी ओर संघ इसे अनावश्यक और राजनीति से प्रेरित विवाद बता रहा है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और तेज होने की संभावना है।



