Top 5 This Week

spot_img

Related Posts

पद्म विभूषण से सम्मानित पंडवानी गायिका तीजन बाई का निधन, भारतीय लोक कला जगत में शोक की लहर

नई दिल्ली, 5 जुलाई। भारतीय लोक कला की दुनिया के लिए रविवार बेहद दुखद समाचार लेकर आया। देश की प्रख्यात पंडवानी गायिका और पद्म विभूषण से सम्मानित डॉ. तीजन बाई का निधन हो गया। वह लंबे समय से अस्वस्थ थीं और उनका उपचार रायपुर स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में चल रहा था। संस्थान की ओर से उनके निधन की पुष्टि की गई है। उनके निधन से छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे देश के सांस्कृतिक और लोक कला जगत में शोक की लहर फैल गई है।

पंडवानी गायन को दिलाई वैश्विक पहचान

डॉ. तीजन बाई ने अपने अद्वितीय गायन, प्रभावशाली अभिनय और सशक्त प्रस्तुति के माध्यम से पंडवानी लोकगायन को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाई। जब वह हाथ में तंबूरा लेकर मंच पर महाभारत की कथाओं का गायन करती थीं, तो दर्शकों को ऐसा अनुभव होता था मानो महाभारत के पात्र उनके सामने सजीव हो उठे हों।

उनकी सशक्त आवाज, भावपूर्ण अभिनय और प्रस्तुति की अनोखी शैली ने उन्हें भारतीय लोक संस्कृति की सबसे प्रतिष्ठित कलाकारों में शामिल किया। उन्होंने दशकों तक देश और विदेश में अनेक मंचों पर भारतीय लोक परंपरा का प्रतिनिधित्व किया।

सम्मानों से सजा रहा गौरवशाली सफर

भारतीय लोक कला के संरक्षण और संवर्धन में उनके असाधारण योगदान के लिए उन्हें अनेक प्रतिष्ठित नागरिक सम्मानों से सम्मानित किया गया। उन्हें पद्मश्री, पद्म भूषण और देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से अलंकृत किया गया। इसके अतिरिक्त उन्हें कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान भी प्राप्त हुए।

औपचारिक शिक्षा सीमित होने के बावजूद उनकी कला और योगदान को देखते हुए विभिन्न विश्वविद्यालयों ने उन्हें चार बार मानद विद्यावाचस्पति उपाधि से सम्मानित किया। यह उनकी असाधारण प्रतिभा और लोक संस्कृति के प्रति समर्पण का प्रमाण है।

संघर्षों के बीच गढ़ी अपनी अलग पहचान

डॉ. तीजन बाई का जन्म छत्तीसगढ़ के गनियारी गांव में हुआ था। पारधी समुदाय से आने वाली तीजन बाई का जीवन संघर्षों से भरा रहा। उस समय महिलाओं का सार्वजनिक मंचों पर पंडवानी गायन स्वीकार्य नहीं माना जाता था। समाज के विरोध और बहिष्कार जैसी कठिन परिस्थितियों का सामना करने के बावजूद उन्होंने अपने कला-साधना का मार्ग नहीं छोड़ा।

उनके अटूट आत्मविश्वास और समर्पण ने उन्हें भारतीय लोक कला की सबसे बड़ी पहचान बना दिया। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहेगा।

परंपराओं को तोड़कर रचा नया इतिहास

तीजन बाई ने बचपन में अपने नाना से महाभारत की कथाएं सुनते हुए पंडवानी गायन की प्रेरणा प्राप्त की। बाद में उन्होंने विधिवत प्रशिक्षण लेकर कम आयु में ही सार्वजनिक मंचों पर प्रस्तुति देना शुरू कर दिया।

उस समय अधिकांश महिला कलाकार बैठकर पारंपरिक शैली में पंडवानी प्रस्तुत करती थीं, लेकिन तीजन बाई ने इस परंपरा को बदलते हुए पुरुष कलाकारों की तरह खड़े होकर प्रस्तुति देने की शैली अपनाई। उनकी इस साहसिक पहल ने पंडवानी गायन को नई पहचान दिलाई और लोक कला के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा।

लोक संस्कृति की अमूल्य विरासत छोड़ गईं तीजन बाई

डॉ. तीजन बाई का निधन भारतीय लोक कला के लिए अपूरणीय क्षति माना जा रहा है। उन्होंने न केवल पंडवानी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया, बल्कि भारतीय लोक संस्कृति को वैश्विक मंच पर सम्मान भी दिलाया। उनकी कला, संघर्ष और समर्पण आने वाली पीढ़ियों को लोक परंपराओं के संरक्षण और संवर्धन की प्रेरणा देते रहेंगे।

Popular Articles